
त्यौहारों का होता बाजारीकरण
आज कल त्यौहारों की धूम है। विजयदशमी, करवा चैथ व आगामी दीपावली आदि सेे प्रत्येक घर में हर्ष व उल्लास का माहौल है। आधुनिक व्यस्तताओं के मध्य ये त्यौहार ही तो है जो कोल्हू के बैल की भाँति जुटे मानसों को परिवार के लिए कुछ समय प्रदान करते है।
आज त्यौहारों का स्वरूप व उन्हें मनाने का ढंग बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से परिवर्तित हो गया है। पिछले कुछ वर्षों की बात करें तो व्यक्ति त्यौहार स्वयं के लिए या परिवार के लिए ना मनाकर बाजार के लिए मना रहा है। अर्थात् त्यौहारों का बाजारीकरण हो रहा है। कोई भी त्यौहार आये बाजार सर्वप्रथम गर्म व सक्रिय हो जाता है। मानवीय व धार्मिक भावनाओं को भुनाना आज का बाजार भली-भाँति सीख गया है।
पहले त्यौहार घर-परिवार-पड़ौस के सभी जन मिलकर मनाते थे। एक दूसरे के यहाँ प्रेम भाव से गृह-निर्मित सामग्री दिया करते थे। परन्तु आज त्यौहार क्बस में मनाये जाने लगे है। घर की बनायी मिठाईयों के स्वाद की हत्या बाजार की मिठाईयों ने कर दी है। दीयों का अस्तित्व इलैक्ट्रिक बल्बों ने खतरे मंे डाल दिया है। उपहासनीय है कि त्यौहार टैक्निकल हो गये है।
त्यौहारों के मनाये जाने का कारण आज यदि बच्चों से पूछा जाता है तो उनका उत्तर स्तब्ध कर देता है। वे नही जानते कि कोई त्यौहार क्यों मनाया जा रहा है। परन्तु वे ये जानते है कि दीपावली पटाखों व मिठाईयों का त्यौहार है। पूर्वजों की सीख से उन्हें कोई सरोकार न होकर मौज मस्ती का त्यौहार प्यारा है।
इस स्थिति में आखिर कब तक पूर्वजों की स्मृति व सीख को बचाया जा सकता है? इस प्रकार तो भारतीय संस्कृति विलुप्त हो जायेगी। कौन जानेगा कि राम कौन? और भगवान कौन? सोचिए..........................
यदि विद्यालयों में प्रयास किया जाए, तो बच्चों के माध्यम से हम अपनी संस्कृति को बचा सकते हैं | त्योहारों को मनाने के तरीकों में पर्यावरण के अनुकूल परिवर्तन अनिवार्य है | आज के बच्चे आने वाले कल की भावी पीढ़ी हैं, उनमें इस विषय के प्रति जागरूकता प्रसारित करने से हम नि:संदेह रूप से सफलता प्राप्त कर सकते हैं |
ReplyDeleteमुझे नहीं लगता है कि बाज़ारीकरण के कारण हम त्यौहारों का अर्थ भूल रहे है बल्कि इसके कारण हम इनमें रुचि बनाए रखते है। हम अपने पूर्वजों की सीख याद रखते है और सम्मिलित्त रूप से खुशी के साथ इन त्यौहारों का आनंद लेते हुए इन्हें मनाते हैं।
ReplyDeleteश्रेय सचेती
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में हम अपनी खुशी तथा तस्सली के लिए त्यौहार नही मनाते बल्कि बाज़ार के लिए मना रहे है. त्योहारों के बाजारीकरण से हम पौराणिक विश्वासों का मज़ाक उड़ा रहे है. आज, त्यौहार बनाने का मूल कारण आपसी प्रेम और उत्साह के लिए नही किंतु ‘कौन ज़्यादा धूम-धाम से मनाता है’ बन गया है. मैं आपकी लेख से पूरी तरह सहमित हूँ. भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है और यह हमारा फ़र्स बनता हैं की हम अपने बच्चो को इन त्योहारों का एतिहासिक, धार्मिक तथा सामाजिक सबंध समझाये.
ReplyDeleteप्रीतिका
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ReplyDeleteमुझे लगता हे की, आज कल की भाग ढोर भरी जिंदगी में, सब लोगो को बस और कामयाब बनना हे. इस बढ़ती भूक से छोटी-छोटी कोसिया भी गायब होने लगी हे. त्योहार खोशी और प्रेम से बनाया जाता था, परन्तु, आज की दुनिया में यह एक मजाक बनगया हे. बच्चे इसकी शर्त मगाते हे की किसकी सबसे जादा रखिया मिलेंगी, पर इससे वह अपनी बहन को चोट पोचासकते हे, और ऑस्की भावनाऊ को भी.
ReplyDeleteआज कल त्यौहार सिर्फ नाच गाना, तोफो, दावत तथा मौज मस्ती तक ही सिमित होकर रह गई है और इसका फायदा लेकर बाज़ारीकरण किया जा रहा है | आज कल की भाग दौड़ भरी जिंदगी में माँ बाप को बचो को त्योहारो का मूल्य सिखाने का समय नहीं है और इसी भाग दौड़ का फायदा उठाकर बाज़ारीकरण किया जाता है | मैं आपके लेख से पूरी तरह सहमत हूँ और हमें जल्द ही अपने आने वाली पीड़ी को अपने संस्कृति से अवगत करना पड़ेगा |
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ReplyDeleteभारत एक ऐसा देश हैं जहाँ बहुत सारे त्यौहार मनाय जाते हैं. आज के दौर में हम त्यौहार केवल माजक के रूप में मनाते हैं. आज की पीड़ी को त्यौहार के कुछ रीती रिवाज नहीं मालूम, बल्कि खाली माजक और आनंद के लिए मनाते हैं. बाजारीकरण एक बड़ा हिस्सा हैं, जिस के कारण हम त्यिहार का असली महत्व भूल कर केवल बाजार से फ़ालतू की चीजे खरीदकर, केवल समाज में यह दिखाना चाहते हैं की हम बड़ी धूम धाम से हर त्यौहार मानते हैं.
ReplyDeleteसाक्षी बियानी