Sunday, May 10, 2015

Book Review- Half Girlfriend

Writer – Chetan Bhagat Half Girlfriend by Chetan Bhagat, again created the same history: The best selling book. As usual I also had the same excitement about the book. But after reading the book I really got disappointed. At this stage of the career people expect more from Chetan but he presented the same stuff again, seems like packaging is new but the product is old. I really don’t want to be harsh but this book bounded me to say this in the straight voice that if you don't want to waste your time please don't go through that. The same kind of dramatic and boring romantic stuff, of no use. Book will start with little filmy drama. Up to the middle also it is bearable, one climax when hero’s girlfriend goes, will definitely create your interest but after reading 2-3 pages of the scene you will return to the old kind of filmy mother's scene with the girlfriend. This will definitely get you bore. End of the book will sucks you. Over dragging struggle of the hero for finding his girlfriend and met in the last night when he was about to leave the place and dropped the idea also, running on the roads, no taxi, heavy snowfall etc., seems like Chetan taking the exam of your patience. Well my suggestion is: to save your time, better to go for any other good one.

Sunday, January 18, 2015

पीके

शहीद भगत सिंह ने कहा था ‘‘आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिए लोग आपको अहंकारी कहेंगे।’’ सच ही कहा है, प्रायः लोग अपनी ‘लकीर के फकीर’ मानसिकता की परिधि से बाहर आते घबराते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि बाहर आने के पश्चात् उन्हें अन्य कोई आसरा नज़र नहीं आता या कोई अन्य मान्यता नहीं मिलती। वे स्वयं को असहाय-असहज महसूस करते हैं। और कदाचित् होते भी हैं। कारण- अज्ञानता, निर्भरता एवं भय। अज्ञानता के कारण वे निर्भर है और निर्भरता के कारण भयभीत। वे प्रायः अगुवाई करने से घबराते हैं और अगर कोई पथप्रदर्शक मिल जाए तो बीच राह में उसके अदृश्य हो, धोखा देने, जो कि मानवीय प्रवृति है, उन्हंे भयभीत कर देती है। वे ग़लत भी नहीं हैं। अक्सर ऐसी राहें जटिल तो होती ही हैं और उन पर दृढ़ रहना उससे भी अधिक कठिन होता है। बहरहाल यहाँ बात है आमिर खान की फिल्म पीके के बहिष्कार की। यह विरोध वास्तव में किसी लतीफे से कम नहीं है। बिलकुल ऐसा, मानो एक दृृृष्टिबाधित कह रहा हो कि सूरज लाल नहीं काला है। वास्तव में उसके लिए सूरज काला ही है और यह कहना उसकी विवशता। परन्तु जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं वे तो विवश नहीं हैं! फिर ये कैसी मानसिकता है? वस्तुतः जिन मुद्दों का विरोध किया जा रहा है वे तो फिल्म का हिस्सा भी नहीं है। विरोध है कि फिल्म हिन्दु विरोधी है और हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान करती है। जबकि फिल्म में प्रत्येक धर्म के ‘‘ठेकेदारों’’ का विरोध किया गया है, न कि किसी धर्म विशेष का। यह फिल्म अंधविश्वास और धर्म का धंधा करने वाले दलालों को केन्द्रित करके बनाई गई है फिर वे चाहे किसी भी धर्म के हों। सच तो यह है कि हम सभी इन ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं। इन्हें अपनी दुकान के रहस्य खुलते प्रतीत हुए तो नचा दिया जन-समूह को विरोध करने के लिए। ये पारंगत हैं मानसिक पराधीनता का दुरुपयोग करने में। क्या ऐसा नहीं है? इस बात का दावा किया जा सकता है कि जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं उनमें से अधिकतर ने तो यह फिल्म देखी भी नहीं होगी। तो भला क्यों कर रहे हैं विरोध? क्योंकि यह फिल्म एक मुस्लिम व्यक्ति ने बनाई है! यह तो कोई मुख्य वजह नहीं हो सकती! बॉलीवुड में हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया जाता है, टॉलीवुड में तमिल एवं इसी प्रकार अन्य। कहीं भी मुस्लिमवुड का अस्तित्व नहीं है और न ही इस प्रकार धर्मविशेष का अस्तित्व होना चाहिए। तो भला इस फिल्म को धर्म विशेष के लिए कैसे बना सकते थे? किसी भी विषय का सामान्यीकरण करके ही प्रस्तुत किया जाना विषय के साथ न्याय करना है। एक ओर तो हम धर्म-निरपेक्षता की बात करते हैं। ‘‘हम सब भारतीय हैं’’, के नारे लगाते हैं। दूसरी ओर किसी भी अनावश्यक विषय को धर्म-जाति से जोड़ देते हैं। किसी भी निर्माण के पीछे छुपी धारणा के स्थान पर निर्माता के धर्म को अधिक महत्त्व कैसे दिया जा सकता है? निर्माता द्वारा परोसी गई अश्लीलता दर्शकों एवं फिल्म की माँग के नाम पर सरलता से स्वीकार कर ली जाती है परन्तु वास्तविक एवं उपयोगी तथ्यों का विरोध मात्र इस आधार पर किया जाता है कि वे किसी धर्म से जुड़े हैं। निश्चित रूप से यह भावी पीढ़ी को भ्रमित करने का घृणित प्रयास है तथा सामाजिक दृष्टि से घातक भी है। इस फिल्म का एक बहुत सुंदर दृृश्य हमारी संकुचित मानसिकता एवं कुतर्कों पर कटाक्ष करता है। पीके पर आरोप था कि वह ईश्वर को नहीं मानता। उससे पूछा गया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते? उसने कहा मानता हूँ। बिलकुल मानता हूँ। मगर उस ईश्वर को मानता हँू जिसने हम सबको बनाया न कि जिसे आपने बनाया। सही ही तो कहा पीके ने। मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च इत्यादि में हमने अपने-अपने स्वार्थानुसार ईश्वर बनाए और अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार उन्हें पूजते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग तो ईश्वर को इसलिए पूजते हैं क्योंकि उनके पूर्वज उनकी पूजा करते आ रहे हैं। यदि उनसे पूछा जाए कि उनके ईश्वर का इतिहास क्या है या उनके माता-पिता कौन थे तो वे इससे अनभिज्ञ है, पूर्णतः निरुत्तर हैं। आज की युवा पीढ़ी तो इतनी आधुनिक हो गई है कि उन्हें होली-दिवाली जैसे मुख्य त्योहारों को मनाने के कारणांे तक का ज्ञान नहीं है। हाँ! लेकिन वे मंदिर अवश्य जाते हैं क्योंकि उनके भगवान जो वहाँ हैं। हम सभी जानते हैं कि मंदिरों में बैठकर किस प्रकार की चर्चाएँ की जाती हैं और प्रत्येक व्यक्ति इस बात की आलोचना भी बहुत ऊँची आवाज़ में करता है परन्तु वे सभी अवसर पाते ही स्वयं भी यही सब करते हैं। सही कहा जाता है कि भाषण दूसरों को देने के लिए ही होते हैं। ख़ैर बात यह है कि क्या यह सच्ची श्रद्धा है? या मात्र दिखावा या आत्मसंतुष्टि? यहाँ पुन शहीद भगत सिंह की बात प्रासांगिक लगती है कि प्रचलन का विरोध सरलता से स्वीकार्य नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ अपनी निरंकुशता के कारण ही समाप्त होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। सती प्रथा हो या विधवा विवाह प्रत्येक प्रथा के प्रति होने वाले विरोध के भी विरोध में लोग मान्यताओें और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का राग अलापते आए हैं परन्तु अन्ततः उन्हें समाप्त होना ही पड़ा। आज समाज के बुद्धिजीवी इन विषयों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा का विषय बना रहे हैं। उनका आम आदमी को इन भ्रमजालों से मुक्त करने का प्रयास सरहानीय है। वास्तव में आम आदमी स्वयं भी कहीं न कहीं इन समस्त पाखंडों से उकता गया है। वह स्वयं भी इन निरर्थक बंधनों से मुक्त होना चाहता है परन्तु साहस नहीं कर पाता। 1947 में भारत स्वतंत्र भले ही हो गया हो परन्तु मानसिक स्वतंत्रता से अभी भी वह कोसों दूर है। इस पराधीनता के अधीन रहकर उन्नति संभव नहीं और यह भौतिक परतंत्रता से कहीं अधिक घातक भी है। एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्वपटल स्वयं को स्थापित करने के लिए भारत को एक स्वतंत्र चिंतक होना अति आवश्यक है।

Monday, February 25, 2013

बहुआयामी परिवर्तन की दरकार

दिल्ली गैंगरेप की घटना ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को जहाँ एक ओर जगहँसाई का पात्र बनाया, वहीं दूसरी ओर यहाँ की लोकतंत्रात्मकता पर शर्मसार कर देने वाला प्रश्न चिह्न भी आरोपित किये। एक ऐसा देश जहाँ भूमि को माँ का दर्जा दे इसकी पूजा की जाती है, भारत माँ के नारों की प्रेरणा रोंगटे खड़े कर देने वाला जोश भर देश की आज़ादी का नेतृत्व करती हो, संस्कृति स्त्री को देवी के रूप में पूजने की रही हो, इतिहास स्त्री सम्मान हेतु रणभूमि में नगाड़े बजाता हो, एक ऐसा देश जिसे विश्व में इसकी सभ्यता के लिए शीर्ष पर रखा जाता हो, ऐसे भारत देश ने विश्वभर में उपर्युक्त समस्त उपमाओं की सत्यता को संदिग्ध ही नहीं किया वरन् अपनी दोगली मानसिकता को प्रमाणित कर दिया। मानसिकता जो कहीं लिखित रूप में तो स्वीकार्य नहीं है, परन्तु सर्वव्यापी है। इस घटना ने भारतीय लोकतंत्र के समस्त महत्त्वपूर्ण स्तम्भों की सार्थकता एवं कर्तव्यनिष्ठा को कटघरे में खड़ा कर दिया। वे महत्त्वपूर्ण स्तम्भ जो किसी भी समाज की सुचारू व्यवस्था के लिए उत्तरदायी हैं। परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, पुलिस, मीडिया एवं तकनीकी वर्तमान में ये किसी भी समाज के अभिन्न अंग हैं। इनमें से किसी भी एक के दिशाहीन होते ही सामाजिक ढाँचा बिगड़ने लगता है। व्यवस्था चरमराने लगती है और अवांछनीय परिणाम पतन के संकेत देने लगते हैं। अतएव एक उत्तम एवं आदर्श समाज की रचना के लिए इन महत्त्वपूर्ण स्तम्भों की विवेचना करनी अति आवश्यक है। समाज की सबसे छोटी एवं महत्त्वपूर्ण इकाई परिवार है। छोटे-छोटे परिवार संयुक्त हो एक बड़े समाज की रचना करते हैं। अगर इसे किसी पौधे की जड़ की संज्ञा दी जाए तो गलत न होगा। यदि किसी पौधे की जड़ों में कोई दोष उत्पन्न हो जाए तो निश्चित रूप से पौधे का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वर्तमान में हमारे पौधे रूपी समाज में की जड़ों में ऐसे अनेक दोष उत्पन्न हो गये हैं। वैचारिक अतिक्रमण ने परिवारों को विछिन्न कर एकलवाद एवं स्वार्थ से निहित कर दिया है। दिल्ली गैंगरेप की वीभत्स घटना को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक दोषों में से एक का चयन किया जाए तो वह है स्त्री के प्रति परिवारों की दूषित एवं तुच्छ मानसिकता। यह वह पुष्प है जिसके कली बनने से पूर्व ही अस्तित्व-संघर्ष की जंग आरंभ हो जाती है। वजूद पाने से पूर्व जानवरों के मुख में फँसे भू्रण प्रश्न करते हैं कि यह समाज हमारी हत्या कर, उपभोग के लिए ही सही परन्तु इस रचना को पुनः कैसे प्राप्त करेगा? जी हाँ, कटु परन्तु सत्य कि ‘स्त्री’ शब्द सामाजिक दृष्टि से चिरकाल से ही ‘उपभोग’ का पर्यायवाची रहा है। प्रत्येक युग व काल स्त्री का उपयोग या कहें स्वार्थपूर्ति हेतु प्रयोग ही करता आया है। इस शब्द का स्वतंत्र अस्तित्व मोटी-मोटी पोथियों में भले ही स्वीकार लिया गया हो परन्तु यर्थाथता स्त्री के प्रति होने वाले अपराध एवं प्रताड़नाओं के समक्ष इस किताबी ज्ञान को सिरे से नकारती है। घर-परिवारों में होते अत्याचार चाहे वे भू्रण हत्या के रूप में हों, घरेलू हिंसा, दहेज, छेड़छाड़, बलात्कार, शोषण, संपत्ति संबंधी झगड़े या छोटे-छोटे भाई-बहन के झगड़ों के रूप में इन सभी में भुक्तभोगी एवं सहता स्त्री ही होती है। उसे विभिन्न कथनों द्वारा कभी सांत्वना दी जाती है तो कभी डराया-धमकाया जाता है परन्तु सहन करने के नैतिक जिम्मेदारी अंततः उसी की ही होती है। कुछ जुमले स्त्री को बचपन से ही याद कराए जाते हैं। जैसे कि तुम लड़की हो। घरेलू कार्य तुम्हारे लिए है और घर के बाहर के कार्य तुम्हारे भाई के लिए। वह भाई है इसलिए अमुक वस्तु पर उसका प्रथम अधिकार है। तुम लड़की हो अतः अमुक कार्य तुम्हारे लिए नहीं है या उसके क्रियान्वयन के लिए तुम निर्बल अथवा अयोग्य हो। हाय! औरत की किस्मत में तो होता ही यह सब है। तुम इस आज़ादी की हकदार नहीं हो क्योंकि तुम लड़की हो। तुम्हारी सीमा यह है इस दायरे के बाहर जाने का प्रयास तुम्हारे जीवन को संकट में डाल सकता है। वगैराह-वगैराह। परिणाम एक आत्मविश्वासविहीन अबला नारी जिस पर फिर एक जिम्मेदारी है महिला सशक्तिकरण के दावों को प्रासंगिक करने की। स्त्री को कमतर आँकने एवं उसे निर्बलता का अहसास कराने का प्रथम आरोप परिवार पर ही लगता है। समान अधिकारों की चर्चा मात्र सम्पत्ति में अधिकार की बपौती बनकर रह गई है। लड़का-लड़की की परवरिश को क्यों अलग-अलग रूपों में निरूपित किया जाता है? ज़रा सोचिए, अगर दोनों की परवरिश समान रूप से की जाए तो दोनों रचनाओं में विभेदीकरण के भाव उत्पन्न ही नहीं हो पाएगें। समानता के धरातल पर की गई परवरिश एक-दूसरे के प्रति आपराधिक भावनाओं से लिप्त विचारों को नष्ट कर देगी। पुरूष होने का गुमान एक बहुत अहम कारण है स्त्री के प्रति होने वाले किसी भी अपराध का। यदि इस गुमान को तठस्थ कर दिया जाए तो पौरुष सिद्ध करने का दबाव पुरूषों पर से समाप्त हो जाएगा। परिणामतः एक सम्मान भाव महिलाओं के प्रति समाज को प्राप्त होगा। इसके विपरीत यदि यही आत्मविश्वास महिलाओं में जागृत किया जाए कि वे किसी भी रूप में पुरूष प्रजाति से कम नहीं तो वह वास्तव में मानसिक रूप से सबल हो सकेगी। सर्वविदित है कि बल प्रत्यक्ष रूप मानसिक दृढता का प्रतीक है। यदि पुरूष जाति को जन्म से यह अहसास कराया जाए कि वह निर्बल है, कमजोर है, पराधीन है तो निश्चित रूप से वह भी वही जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाएगा जो 99 प्रतिशत आधी आबादी आज जी रही है। यह विषय आज़ादी एवं अधिकारों से कहीं अधिक मानसिक परिवर्तन का है। महिला सशक्तिकरण शब्दावली के प्रयोग ने ही महिलाओं में परिवर्तन की ब्यार का प्रदर्शन किया है। यदि जन्म से ही इस शब्द से वास्तव में उन्हें जोड़ा जाए तो क्या कोई महिला अबला रहेगी? यह दायित्व परिवार एवं शिक्षा का है। महिलाओं को तुच्छ होने के बोध से स्वतंत्र कराते हुए उनका साथ दिया जाए। बजाए उन्हें परजीवी बनाने के, उन्हंे आत्मनिर्भर की परिभाषा समझाई जाए। बजाए सामाजिक व्याधियों, निष्ठुरता, कठोरता एवं विभिन्न नकारात्मक शब्दावली से डराने के उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप दृढ़ किया जाए। बजाए उन्हें घर में बंद करने के उस प्रदूषित मानसिकता से लड़ने की शक्ति प्रदान की जाए जो उनके आत्मबल पर प्रहार करती है। किसी महिला के विरूध हुए अपराध के पश्चात् सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका उसके परिवार की होती है। ऐसी स्थिति में परिवार के संयंमित एवं संतुलित संवाद उस महिला के भविष्य को सुनिश्चित करते हैं। यह वह क्षण है जो उसे तिमिर में रोशनी की किरण भी दिखा सकता है और गुमनाम, लक्ष्यहीन अंधकारमय जीवन भी दे सकता है। उसे भविष्य में आगे बढने की प्रेरणा भी दे सकता है और निराशावादी एवं अवसादग्रस्त जीवन भी। परिवार यदि संतुलित मानसिकता का धनी हो तो निश्चित रूप से वह उसे अपराजिता बना सकता है। अमूमन परिवार किसी अवांछनीय-अप्रिय घटना के पश्चात् महिला की पहचान छिपाकर, लिपटे चहरे को आत्मग्लानि से भरने के प्रबल समर्थक होते हैं। यदि परिवार पूर्ण आत्मविश्वास एवं दृढ़ता से उस महिला का सम्मान समाज के समक्ष करे और उसके निर्दोष व्यक्तित्व को स्वीकार करे तो कभी कोई समाज ऐसी किसी भी भुक्तभोगी का उपहास करने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा। हम जिस रूप में स्वयं को स्वीकारते हैं समाज बाध्य होता है हमें उसी रूप में स्वीकार करने के लिए। बस आवश्यकता होती है हमारे दृढ़ निर्णय एवं आत्मविश्वास की। कहा भी गया है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। लिहाजा निर्दाेष को घृणित दृष्टि से लज्जित करने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। यह हमारी सामाजिक विडम्बना है कि वह किसी की बेचारगी/बेबसी को चर्चा का विषय अपने रसास्वादन के लिए बनाता ही है। तो क्यों परिवार ऐसे अवसर व अनुमति प्रदान करे जिससे व्यक्ति विशेष सरकस के जोकर की भाँति मनोरंजन का साधन बन जाए? अब अगर बात की जाए समाज की तो परिवार की ही भाँति समाज भी किसी भी अपराध की जड़ को सींचने के लिए समान रूप से उत्तरदायी है। देखा जाए तो समाज परिवार का ही अप्रत्यक्ष रूप है। जो भूमिका एवं दायित्व परिवार के हैं, वही समस्त समाज के भी हैं। परन्तु इससे भिन्न समाज एक स्वतंत्र संस्था के रूप में भी है। समाज आंतरिक संरचना छोटे-छोटे अनेक समाजों में विभक्त हैं, जो अपनी-अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके अपने सामाजिक नियम, कायदे-कानून, व्याख्याएँ हैं जो संबंधित इकाई पर लागू होते हैं। समाज और परिवार एक-दूसरे के पूरक हैं। कभी एक-एक परिवार मिलकर समाज के स्वरूप को परिवर्तित कर देता है तो कभी समाज किसी परिवार के वजूद-स्थायित्व का धोतक होता है। पुरूष प्रधान सरीखी संकीर्ण मानसिकता आज भी हमारे समाज को नियंत्रित कर रही है। पुरूष अपनी सत्ता कायम रखने के लिए प्रत्येक प्रकार के हथकंडे अपनाने के लिए तत्पर है। दिल्ली गैंगरेप कांड पुरूष सत्तात्मक विचारधारा का ही परिणाम है। इस कांड ने तथाकथित समाज के बहुत से वर्गों व इकाईयों की पोल खोल दी। महिलाओं के विरूध होती ब्यानबाजी ने यह तो सिद्ध कर दिया है कि समाज, जिसमें राजनेता से लेकर हर छोटी-बड़ी संस्था को भी यदि सम्मिलित किया जाए तो स्त्री सम्मान एवं अधिकारों का मात्र दिखावा किया जाता है। वस्तुतः यह सब एक छलावा है। पिछले कुछ वर्षों से ज्वलंत रहने वाली खाप के अनेक फतवे लड़कियों के लिए आते रहे हैं और आते रहेंगे। उन्हें क्या पहनना है, क्या करना है, कहाँ जाना है, किससे विवाह करना है, इत्यादि। परन्तु इतनी जघन्य कांड पर एक भी फतवा किसी पुरूष के लिए कोई सीमा रेखा न खींच सका। एक भी संवाद दिल्ली गैंगरेप पीड़िता के प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिए प्रस्फूटित न हुआ। खाप पंचायतों के किसी भी नेता ने एक बार भी किसी लड़के को उसकी मर्यादा याद नहीं दिलाई। एक भी नेता ने ऐसे अपराध में दोषी को वे क्या सजा देंगे, इसकी विवेचना नहीं की। इज्जत के लिए ऑनर किलिंग के निर्देश देने वाली खाप आज क्यों अपनी बेटी-बहुओं की इज्जत के लिए एक शब्द मुख से नहीं निकाल रही है? अपने कानून स्वयं निर्मित करने वाली खाप की कानूनी किताब में ऐसे अपराधों के लिए न्याय की क्या व्यवस्था है? अगर खाप महिलाओं के दायरे तय करती है तो उसे पुरूषों के दायरे तय करने में इतना संकोच क्यांे? शायद इसीलिए क्योंकि किसी भी खाप पंचायत की सदस्या के रूप में एक भी महिला नहीं है। पुरूषवादी खाप भला अपनी सीमाएँ कैसी बाँध सकती है? लड़कियों के छोटे कपड़े इन्हंे अपराध करने के लिए उकसाते हैं, परन्तु समझ से परे है कि ढाई महीने की बच्ची से 75 वर्ष की वृद्धा इन्हें कैसे आकर्षित करती है? यह सवाल सदैव अनुत्तरित रहा है। क्यों बलात्कार की सजा के रूप में 25 हजार का मुआवजा इन्हें लज्जित नहीं करता? क्यों मर जाती हैं इनकी संवेदनाएँ स्त्री के प्रति? क्यों अस्वीकार्य हैं ऐसे समाज को स्त्री का अस्तित्व? क्यों लड़की के जन्म पर इनके सम्बोधन ‘नकुशा’ (अभागिन/अनचाही/अपशगुनी) हैं? एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार-पत्र में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार ‘‘आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जिलाध्यक्ष और हापुड़ रोड़ स्थित मदरसा जामिया मदनिया के मोहतमिम कारी शफीकुर्रहमान ने कहा कि अविवाहित दुराचार करे तो उसे सौ कोड़े मारने की सजा है और शादीशुदा करे तो उसे संगसार करने का हुक्म है। दुराचार औरत की रजामंदी के बगैर नहीं हो सकता। कम कपड़े पहनने से पुरूषों के जज्बात भड़कते हैं।’’ एक अन्य समाचार-पत्र के अनुसार एक मुस्लिम देश में महिलाओं को ऐसे बुरके न पहनने का फतवा जारी किया गया है जिसमें से उनके आँखें दिखाई दें, क्योंकि महिलाएँ आँखों के माध्यम से पुरूषों को आकर्षित करती हैं? स्तब्ध कर देने वाली ऐसी असंवेदनशीलता पितृसत्तात्मकता की पैरवी करती है! एक औरत के सम्मान की सजा सौ कोड़े! उसकी रजामंदी न तब पूछी गई जब उसकी आत्मा की हत्या की जा रही थी और न तब पूछी गई जब उस पर निकृष्ट मिथक मरहम लगाया जा रहा था। मानो कि वह को निर्जीव वस्तु हो जिसे किसी अवांछित स्पर्श का कोई फर्क ही न पड़ता हो। औरत को दया, प्रेम, ममता, संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ति माना जाता है और उससे इन्हीं से युक्त व्यवहार की अपेक्षा की जाती है परन्तु जब उसे इन्हीं कोमलताओं की आवश्यकता होती है तो कैसे सारी संवेदनाएँ अपंग हो जाती हैं? ऐसे अनेक ‘क्यों’ है जो स्त्री संदर्भ में गूँगे हो जाते हैं। मेरे ‘क्यों’ पुरूषप्रधान जड़ता से ये हैं कि ‘‘क्यों महिलाओं के छोटे कपड़े देखकर उनके जज्बात भड़कते हैं? क्यों वे पर-औरत का सम्मान उसी प्रकार नहीं कर पाते जैसे वे अपने घर की महिलाओं का करते हैं? क्यों महिलाओं के उकसाने पर वे आत्मनियंत्रित नहीं हो पाते? क्यों वे गलत संकेत देने वाली महिलाओं को एक थप्पड़ मारकर यह नहीं कह पाते कि वह गलत है? क्यों वे उनके साथ हो लेते हैं? क्यों वे ऐसी महिलाओं के विरूध पुलिस में शिकायत नहीं करते? क्यों उनका मस्तिष्क इतना पवित्र नहीं है कि महिलाओं के किसी भी व्यवहार पर वे तठस्थ रहें? क्यों वे अपनी कमजोरियों का दोषारोपण महिलाओं पर करते हैं? क्यों बलात्कार के लिए वे दोषी नहीं हैं? क्यों उनकी नज़र महिलाओं के उभारों को देखने के लिए ललचाती है? क्यों वे महिलाओं का उपयोग व उपभोग करना अपना एकाधिकार मानते हैं? क्यों वे महिलाओं को अपनी शारीरिक ताकत के बल पर जीतना चाहते हैं? क्यों पुरूष ही महिलाओं का शोषण करता है? क्यों सारी सीमाएँ-प्रतिबधताएँ महिलाओं के लिए ही हैं? क्यों भुक्तभोगी होने पर भी स्त्री ही शर्मिंदा हो और पुरूष शान से जीये? क्यों वे समाज में महिलाओं की समान रूप से भागीदारी के पक्षधर नहीं हैं? क्यों अपनी सफलता महिलाओं की देह से सींचते हैं?’’ इन प्रश्नों के उत्तर स्वरूप अक्सर सृष्टि के रचनाकर्ता पर दोष मढ़ा जाता हैै। परन्तु किसी भी अज्ञात शक्ति पर दोषारोपण कर स्वयं की मानसिक विकलांगता से मुख नहीं मोड़ा जा सकता। ये वे सामाजिक व्याधियाँ हैं जो महिला सशक्तिकरण को चरितार्थ करने में बाधक हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन समस्त ‘क्यों’ का कारण पुरूष प्रधान समाज की हीनभावना व असुरक्षा की भावना हो। महिलाओं को सदैव दुर्बलता का पर्याय मानने वाला समाज कहीं स्त्री के चाँद की ओर अग्रसर होते कदमों से भयभीत तो नहीं है? उनकी उन्नति उसे द्वेष व जलन की भावना से भर कुण्ठित एवं अवसादग्रस्त तो नहीं कर रही? जिसके अधीन वह अपने प्राकृतिक वरदान का दुरूपयोग कर स्वयं को सिद्ध करने का अभ्यास कर रहा है। महिलाओं ने गृह-प्रबंधन में अपना लौहा मनवा गृह-लक्ष्मी का स्थान ग्रहण किया है और घर से बाहर भी प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं को पुरूषों से बेहतर सिद्ध किया है। यही प्रतिस्पर्धा महिलाओं के प्रति बढते अपराधों में उत्प्रेरक का कार्य कर रही है। समाज स्वयं भी एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की नियमावली की अवहेलना करने का दोषी है। पक्षपाती दुर्भावनाएँ तो विजेता का चयन पूर्व में ही कर चुकी हैं। दिखावटी नीतियाँ मात्र औपचारिकता का निर्वहन कर रही हैं। चौथे विश्व महिला सम्मेलन में यह बात उभर कर सामने आई कि परिवार और समाज में महिलाओं की प्रतिष्ठा कम होने के कारण ही मुख्यतः उनके खिलाफ हिंसा होती है। महिलाओं के सुरक्षा उपायों के क्रम में कुछ आँकड़े एकत्रित किए गए जिनसे पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा दुनिया के कोने-कोने में व्याप्त है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका में प्रत्येक 90 सेकेंड में एक महिला पर बलात्कार किया जाता है और प्रत्येक वर्ष लगभग 3,20,2000 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक घंटे 16 महिलाओं की एक बलात्कारी से मुठभेड़ होती है और प्रत्येक छः मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार होती है। फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन यानी संघीय जाँच ब्यूरो ने 1991 में अमेरिका में 106,593 बलात्कार के मामले दर्ज किए थे। जुलाई 1991 में किशोर लड़कों के एक समूह ने पूर्वी अफ्रीका के एक देश में स्कूली छात्रावास में रहने वाली 71 लड़कियों को केवल इस कारण बलात्कार कर दंडित किया क्योंकि उन्होंने स्थानीय विद्यालय प्रशासकों के खिलाफ हड़ताल करने से मना कर दिया था। इस मामले में 19 लड़कियों ने अपना जीवन गवाँ दिया था। इस प्रकार के आँकडे़ देखने से पता चलता है कि पूरी दुनिया में महिलाओं और लड़कियों पर यौनाचार होना एक आम बात है। किसी न किसी धार्मिक या परम्परागत प्रथाओं का सहारा लेकर महिलाओं पर अत्याचार किया जाता है। समाज मात्र एक शब्द नहीं वरन् एक जिम्मेदारी है इसकी परिधि में समाहित प्रत्येक निर्जीव व सजीव के प्रति। दायित्वबोध से पूर्ण समाज की गंभीर भूमिका स्त्रियों को न्यायोचित एवं समान स्थान दिलाने के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए समाज का निष्पक्ष एवं संवेदनशीन होना अति आवश्यक है। आधी आबादी एक नवजात पौधे की भाँति है जो पुरूष सत्ता में धीरे-धीरे उभरने का प्रयास कर रही है। देखना यह है कि अकेले राज करने वाली इस सत्ता में पुरूष समाज किस प्रकार अपनी समझदारी का परिचय देते हुए आधी आबादी का स्वागत करेगा? बहरहाल पंक्ति में तीसरा नम्बर धर्म का है। एनडीटीवी इण्डिया चैनल के पत्रकार रवीश कुमार ने दिल्ली गैंगरेप की घटना से व्यथित हो एक बहुत गहरी एवं सटीक बात कही कि भारत में स्त्रियों की पूजा देवी के रूप में मात्र किताबों या मूर्तियों में होती है, वास्तविक जीवन में तो उसे रिश्तों में ही रौंदा गया है। बिलकुल सही चित्रण प्रस्तुत किया है रवीश जी ने। धर्म के नाम पर हम स्त्री के प्रत्येक रूप का शोषण ही तो करते आए हैं। मुस्लिम धर्म में पुरूष को दो निकाह करने की धार्मिक मान्यता प्रदत है। सरकार भी मुस्लिम स्त्री के अधिकारों को धार्मिक प्रैक्टिस करने के तहत अधिनस्थ करती है। मुस्लिम धर्म में ही नहीं, हिन्दु धर्म में भी भगवान कृष्ण की भाँति अनेक भगवान दो पत्नियों के स्वामी हैं। क्यों यह अधिकार किसी स्त्री/देवी के पास संरक्षित नहीं है? क्यों धर्मों में भी स्त्री-पुरूष के अधिकारों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार की सेंध हैं? यदि धर्म ही दोगला हो तो अनुसरणकर्ता से क्या अपेक्षा की जाए? महाभारत में द्रौपदी को पाँच पांडवों की पत्नी ‘पाँचाली’ के रूप में दर्शाया गया है। शायद भारतीय इतिहास में वह एकमात्र ऐसे महिला थी, जिनके पाँच पति थे। परन्तु यह भी कोई गर्व का विषय भी रहा। वर्तमान में ‘पाँचाली’ शब्द का सम्बोधन नारी को चरित्रहीन की उपमा दे, अपमानित करने के लिए प्रयुक्त होता है। कहना गलत न होगा कि धर्म स्त्री को कमजोर बनाता है। स्तंभों की श्रृंखला में आगे बढे़ं तो अगला क्रम राजनीति का है। प्राचीन काल से ही राजनीति को लभाने वाला विषय ‘स्त्री’ ही रहा है। चौपड़ के पासों से वर्तमान सत्ता के गलियारे तक जब-तब ‘महिलाओं’ पर ही शह और मात का खेल खेला गया। महिला आरक्षण से अधिकारों तक के सफ़र में कितनी सियासतें बदली परन्तु इस विषय ने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई। महिलाओं के अधिकारों पर चुनावी राजनीति करने वाले महिलाओं के मान-सम्मान प्रति कितने संवेदनशील हैं यह या तो चौपड़ के पासों में सिसकती द्रौपदी बता सकती है या वर्तमान राजनीतिज्ञों की औछी मानसिकता (ब्यानबाजी) की शिकार महिलाएँ। एक ऐसा समय जिस पर सारा देश शर्मिंदा है और नैतिक आधार पर कहीं न कहीं स्वयं को दोषी मान रहा है, ऐसे समय में भारत के प्रथम व्यक्ति अर्थात् माननीय राष्ट्रपति के पुत्र का ब्यान कि छात्राओं के नाम पर रैलियों में सुंदर-सुंदर डेंटेड-पेंटेड महिलाएँ पहुँच रही हैं। दिल्ली में जो हो रहा है वो गुलाबी क्रांति है, जिसका जमीनी हकीकत से कोई लेनदेना नहीं है। पहले ये महिलाएँ कैंडल लेकर जुलूस निकालती हैं और फिर शाम को डिस्कोथेक में जाती हैं, निंदनीय है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते ये व्यक्तित्व कितने अमानवीय हैं! औरत की प्रतिष्ठा तार-तार करने वाला यह कोई एकमात्र ब्यान नहीं है कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया नेता धु्रवनारायण के लिए कहते हैं कि जब तक उनके साथ 4-5 महिलाएँ नहीं होती, उसे नींद नहीं आती है। गौरतलब है कि भूरिया इस कथन में किसका अपमान कर रहे हैं- महिलाओं का या प्रतिद्वंदी का? अपने शब्दजाल की राजनीति में ये क्यों स्त्रियों की गरिमा के साथ खेलते हैं? संविधान के किस भाग में इन्हें यह अधिकार प्राप्त है? क्या आधी आबादी को इन्हें वोट देने की सजा के प्रतिफल स्वरूप यह दुर्भाग्य प्राप्त हुआ है? माकपा नेता अनीसुर रहमान ममता बनर्जी से पूछते हैं कि वे रेप के लिए कितना चार्ज लंेगी? कांग्रेस सांसद संजय निरुपम, स्मृति इरानी से कहते हैं कि चार दिन हुए नहीं और आप राजनीतिक विश्लेषक बनती फिर रही हैं, आप तो टीवी पर ठुमके लगाती थीं। राजनेताओं के कलेवर में ये कैसी तुच्छ असुर मानसिकता विकसित एवं प्रसारित हो रही है! जब मार्गदर्शक ही दिग्भ्रमित हैं तो कैसे अपेक्षा की जाए सकारात्मक परिवर्तन की? क्या मिल पाएगा कोई न्याय इस विचारमूढ़ता से? स्त्री चरित्र पर उंगलियाँ उठाते ये चेहरे स्वयं के पाँव भी नहीं देखते कि कितने कीचड़ में हैं! स्वयं आपराधिक धाराओं का बोझ उठाते हुए भी इनकी निर्लज टिप्पणी लज्जा को भी लज्जित कर दे। इनकी स्वार्थी नीयत क्या चरित्रहीनता की प्रतीक नहीं है? क्या इन पर अंकुश लगाने का कोई प्रबंध नहीं होना चाहिए? इन बड़बोलों के विरुध कोई कार्रवाही क्यों नहीं होती? ये कानून के निर्माता है, संविधान के रचियता हैं। देश की प्रत्येक संस्था व व्यवस्था इनकी मुट्ठी में हैं। शायद तभी सौ गुनाह करके भी ये निर्दाेष हैं। वर्तमान राजनीति में क्राँतिकारी परिवर्तनों की आवश्यकता है। एक ऐसी राजनीति जो स्वार्थभाव से परे देशहित के विषय में विचार करे। अंग्रेजों ने भारतीय मस्तिष्कों को नियंत्रित करने के लिए ‘डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थियोरी’ को अनुसरण किया। इसके तहत उन्होंने उच्च वर्ग को शिक्षित करना आरंभ किया। इस थियोरी के अनुसार, जिस जीवन शैली का उच्च वर्ग यापन करता है, निम्न व मध्यम वर्ग भी उसी जीवन शैली का अनुसरण करता है। भारत मंे आज्ञा का अनुपालन करने वाले बाबूओं का निर्माण करने के ध्येय से इस थियोरी का क्रियान्वयन किया गया। हुआ भी वही। अंग्रेजों की इस नीति ने यह तो सिद्ध कर दिया कि परिवर्तन का क्रम ऊपर से नीचे की ओर चलता है। अगर हम भारत को एक आदर्श राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति का विशदीकरण किया जाना चाहिए। हालांकि यह एक लतीफा है परन्तु ईश्वर से प्रार्थना है कि सच हो जाए.................. जून 22, 2011 के दैनिक समाचार-पत्र दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश में बलात्कार और महिलाओं से छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र राज्यसरकार (सुश्री मायावती सरकार) ने दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं में संशोधन का फैसला किया था। इसके अनुसार बलात्कार से जुड़े मुकदमों का फैसला सिर्फ छः महीनों में (सीआरपीसी की धारा 235 में एक उपधारा जोड़ी जाएगी) हो जाएगा। बलात्कार के आरोपी को तब तक जमानत नहीं मिलेगी, जब तक वह यह साबित न कर दे कि वह दोषी नहीं है और महिलाओं की शील भंग से जुड़े सभी अपराध भी गैर जमानती हो जाएंगे। तमिलनाडु में इस प्रकार की घटनाओं के लिए गैर जमानती वारंट का प्रावधान है। निःसंदेह यह संशोधन कानूनी प्रक्रिया में तीव्रता लाने की दृष्टि से सहायक सिद्ध होगा। यदि इस प्रकार के अपराध गैर जमानती हो जाए तो न केवल इससे भुक्तभोगी को सुरक्षा प्राप्त होगी वरन् लोगों में कुकर्त्यों के प्रति भय भी व्याप्त होगा। आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगाने हेतु इस प्रकार के कठोर कानून बनाए जाने चाहिए। परन्तु बड़े-बड़े नेता बड़ी-बड़ी संस्तुतियाँ! उत्तर प्रदेश में किया जा रहा यह संशोधन कब अज्ञातवासी हो गया, कुछ पता न चला। लंबित केसों की फेहरिस्त (वृंदा करात के अनुसार देश में रेप के 80 हजार मामले लंबित हैं।) यदि एक साथ रख दी जाए तो निश्चित रूप से उसके नीचे दबने से किसी के प्राण पखेरू हो जाएंगे। ‘क्या हुआ तेरा वादा’, कवि ने भी ये पंक्तियाँ लिखते हुए न सोचा होगा कि नेताओं के संदर्भ में ये इतनी प्रासंगिक हो जाएंगी। अब बलात्कार की सजा ‘फाँसी’ को लेकर चल रही कश्मकश का भी परिणाम ऐसी ही कुछ रहेगा, इसका हमें पूर्ण विश्वास है। एक यही तो भरोसा है जो डगमगा नहीं सकता। बलात्कार की सजा ‘फाँसी’ के विरोध में एक मुद्दा बहुतायत उठाया गया कि यदि फाँसी की सजा निर्धारित की गई तो सबूत मिटाने के लिए हत्याएँ बढ़ जाएँगी। परन्तु अगर न्याय पाने के लिए 15-15 साल ज़लील होना पड़े तो क्या यह किसी हत्या से कम है? 15-20 साल खौफ़ के साए में जीना पड़े, क्या यह कोई जीवन है? और बेखौफ़ घूम रहे अपराधी ही अगर हत्या कर दें??? और सर्वाधिक कष्टकारी यदि 20 साल के बाद भी न्याय न मिले??? मिले तो 7 वर्ष की...??? 20 साल का संघर्ष, पीड़ा, खौफ़, जलालत सब भुक्तभोगी के हिस्से में और सजा 7 वर्ष की................ क्या यह अन्याय नहीं है। यही कारण है कि भुक्तभोगी न्यायालय जाने से कतराते हैं क्योंकि वहाँ अन्याय की गारंटी है। अगर बलात्कार की सजा फाँसी हो तो उसके दो मुख्य लाभ हैं- एक, अपराधी के मन में खौफ़ उत्पन्न हो जाएगा और इस प्रकार के अपराध कम हो सकेंगे। कहा भी गया है- स्पेयर द रोड़, स्पाइल द चाइल्ड। अनुशासन के लिए दंड आवश्यक है। दो, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दूषित मानसिकता का प्रसार न हो पाएगा। इस प्रकार के अपराधी समाज मंे एक नासूर की भाँति हैं। यदि समय रहते इस अंग को पृथक न किया गया तो यह समाज के अन्य अंगों को भी क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। ये अपराधी अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को अभिप्ररित करते हैं। इसका प्रमाण दिल्ली गैंगरेप में सम्मिलित वह नाबालिग अपराधी है जिसकी वैचारिक क्षमता अन्य अपराधियों से प्रभावित एवं संचालित थी। ज़रा सोचिए ऐसे अपराधियों की घातक उपस्थिति समाज में वैचारिक अतिक्रमण के संचरण में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती होगी! ऐसे नासूरों का सामाजिक बहिष्करण स्वस्थ समाज की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए, जिससे इनकी उपस्थिति किसी भी अपराधिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहित न कर सके। अतएव इस अपराध के दंडस्वरूप एकमात्र सजा फाँसी ही होनी चाहिए। मात्र नवीन कानूनों का निर्माण किसी भी समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं है। सही मायनों में देखा जाए तो हमारे देश में अपराधों को रोकने के पर्याप्त कानून मौजूद हैं। आवश्यकता है उन्हें सुचारू रूप से क्रियान्वित करने की। न केवल दिल्ली की अपितु देशभर की पुलिस अपनी कर्तव्यनिष्ठा को प्रमाणित करने में अक्षम सिद्ध हो रही है। क्या कारण है कि पुलिस स्वयं को समाज के साथ नहीं जोड़ पा रही है? पुलिस होना क्या कोई अनोखी बात है? या पुलिस स्वयं को प्राप्त अधिकारों के नशे में अपने दायित्वबोध से विमुख हो गई है? क्यों एक आम आदमी पुलिस के नाम से भी डरता है? क्यों भुक्तभोगी की चित्कार बंद कमरों में विलुप्त हो जाती है? क्यों आज अपराधियों से अधिक भय पुलिस का व्याप्त है? क्यों देश के नागरिक कानूनी पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते और कमाल की बात तो यह है कि कानून के रखवाले, इसके निर्माता व संशोधनकर्ता भी इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते। शायद इसे ही आपसे समझौते की स्थिति की संज्ञा दी जाती है। पारस्परिक समझ का इससे उम्दा उदाहरण क्या हो सकता है? जून 22, 2011 (दैनिक जागरण, पृष्ठ-11) के एक समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश में दुराचार का औसत हर दिन चार बलात्कार का है। 2010 में दुराचार के 1290 मामले दर्ज किए गए। 2012 में देश में हर 22 मिनट में एक बलात्कार की घटना घटित होती है। उत्तर प्रदेश में दिसंबर से पिछले दस महीनों में 1500 दुराचार की घटनाएँ (मायावती के आंकड़ों के अनुसार) दर्ज की गई। वस्तुतः पुलिस की संवेदनहीनता ने पुलिस को ही कटघरे ला खड़ा किया है। शिकायतकर्ता की शिकायत दर्ज न करना, भ्रष्टाचार की अंतिम सीमा तक गिरा हुआ अभद्र व्यवहार, निष्ठुर एवं कठोर शब्दावली, अशोभनीय प्रश्नावली, शोचनीय मुद्राएँ पुलिस की विश्वसनीयता समाप्त कर चुकी हैं। पुलिस होना एक जिम्मेदारी कम अंहकार का विषय अधिक हो गया है। कितनी ही बार हमारी रक्षक कही जाने वाली पुलिस ही भक्षक का रूप धारण करती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पुलिस के चोगे में कोई अपराधी ही उपहास कर रहा हो! कौन सुनेगा इस आवाम की आवाज़??? मुझे याद है बलात्कार/रेप जैसे शब्द अपने अभिभावकों के सम्मुख हम सुनते भी झिझकते थे। टीवी चैनल पर इन घटनाओं से संबंधित खबरें आते ही बगले झांकना व समाचार पत्रों के पृष्ठ को झट से पलट देना यह इसलिए नहीं होता था कि इस प्रकार के समाचारों से हम मुख मोड़ना चाहते थे वरन् इन शब्दों का परिवार के मध्य प्रयोग न होना, शर्म-हया का प्रतीक समझा जाता था। पिछले कुछ दिनों में मीडिया में इन शब्दों का इस प्रकार खुलकर प्रयोग हुआ है कि चार वर्ष के बच्चे को बलात्कार का अर्थ भले ही न पता हो परन्तु वह इस शब्द से भली-भाँति परिचित है। निःसंदेह मीडिया ने दिल्ली गैंगरेप कांड में अपनी महती भूमिका निभाई है, जिसके लिए उसकी सरहाना की जानी चाहिए। सच कहें तो इस कांड के प्रति सर्वाधिक गंभीर, जिम्मेदार एवं संवेदनशील भूमिका मीडिया ने ही अदा की है। पूरी घटना का कवरेज मानो निष्पक्ष एवं स्वार्थरहित रहा हो। परन्तु अगर इस घटना के कवरेज के दूरगामी परिणाम देखें तो वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं। समाज में शब्दावली के प्रति जितना खुलापन मीडिया ने प्रदान किया है यह उसी का परिणाम है कि छोटे-छोटे बच्चे उन अपराधों में संलिप्त पाए जा रहे हैं जिनके अर्थ तक से वे अनभिज्ञ है। यदि चार वर्ष का बच्चा रेप शब्द के प्रति अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है तो कितना कठिन है उसके प्रश्न का उत्तर देना। और यदि वह संतुष्ट नहीं हो पाता हमारे सुलभ इलैक्ट्रॉनिक साधन जैसे इंटरनेट इत्यादि इन्हें विभिन्न प्रकार की किन्तु अनावश्यक जानकारियाँ भी अत्यन्त सरलता से प्रदान कर देते हैं। इंटरनेट पर ज्ञान के अकूत भंडार से लाभकारी अथवा विनाशक जानकारी के चयन की समझ बच्चों में नहीं होती, जिसके कारण वे भटकाव के शिकार हो जाते हैं। आज मीडिया का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो चुका है। समाचारों की परिधि से बाहर इसने स्वयं को फिल्म, साहित्य व मनोरंजन इत्यादि के क्षेत्र तक विस्तार प्रदान किया है। फिल्मों का अंधानुकरण किस प्रकार हमारे समाज में किया जाता है, यह सर्वविदित है। वर्तमान में फिल्में मनोरंजन एवं पब्लिक डिमांड का वास्ता दे अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दिला चुकी है। आइटम साँग की उँगली पकड़ फिल्मों में अश्लीलता की सभी मर्यादाएँ पार हो चुकी हैं। गालियाँ जिनके प्रयोग पर प्रायः परिजनों की मार व विद्यालय से अभिभावकों के पास शिकायतों का पर्चा आ जाया करता था, अब वे समस्त गालियाँ आप गानों के माध्यम से बहुत सरलता से प्रयोग कर सकते हैं। काश! संेसर बोर्ड ने ‘इश्क कमीना’ को सेंसर किया होता तो आज ‘हनी सिंह’ की हिम्मत इतनी न बढ़ी होती। यदि महेश भट्ट की प्रथम प्रस्तुती पर संेसर बोर्ड ने अपनी जिम्मेदारी का भलीभाँति पालन किया होता तो यह मर्यादा ‘डर्टी पिक्चर’ तक कभी उल्लंघित नहीं होती। पब्लिक डिमांड के नाम पर फिल्मों का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। फिल्मों का उद्देश्य समाज को अभिप्रेरित, सजग एवं जागरूक करना है। इसके लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि फिल्मों का स्तर गिराया जाए। यदि प्रतिस्पर्धा के दबाव से मुक्त हो सभी निर्माता शालीनता के प्रति अपनी मस्तिष्क का प्रयोग करें अथवा प्रतिस्पर्धा, अच्छा और अच्छा करने की, की जाए तो निश्चित रूप से एक आदर्श समाज का निर्माण हो सकेगा। ऐसा नहीं है कि ‘एंटरटेन्मेंट’ की दुनिया में मात्र अश्लीलता ही है। बहुत से टीवी चैनल जैसे ‘सब टीवी’ ‘एंटरटेन्मेंट एवं शालीनता’ की मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। हल्के-फुल्के लतीफों के माध्यम में जीवन का अद्भुत संदेश इस पर प्रसारित नाटकों के माध्यम से दिया जाता है। यदि सम्पूर्ण फिल्म जगत यह निश्चित कर ले कि सामाजिक मूल्यों की हत्या किए बिना मनोरंजन की प्रस्तुती की जाएगी तो ‘समाज वही देखता और स्वीकारता है जो इनके द्वारा दिखाया जाता है’। आज भी धार्मिक सीरियल उसी श्रद्धा से देखे जाते हैं जिस श्रद्धा से वर्षों पूर्व महाभारत और श्रीकृष्णा देखे जाते थे। सत्यमेव जयते, कौन बनेगा करोड़पति, परवरिश इत्यादि की टीआरपी सिद्ध करती है कि जनता मात्र नग्नता की प्रशंसक नहीं है। आस्ट्रेलियन चाइल्डहुड फाउंडेशन द्वारा किए गए शोध के अनुसार ‘अश्लील और हिंसक विज्ञापन बिगाड़ते हैं बच्चों का व्यवहार’। विज्ञापनों और वीडियो गेम में परोसे जा रहे ऐसे दृश्यों से छोटे बच्चों यानी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का व्यवहार हिंसात्मक हो रहा है। इन विज्ञापनों एवं वीडियों गेम के आदि बच्चों के सेक्सुअल व्यवहार न केवल अनैतिक थे बल्कि विपथगामी थे। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले एक दशक से बच्चों में यह प्रवृत्ति करीब 20 गुना तेजी से बढ़ी है। उपर्युक्त रिपोर्ट से समस्या की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि क्यों हमारे बच्चे आक्रमक, अनियंत्रित एवं पथभ्रष्ट हो रहे हैं? मीडिया का सकारात्मक योगदान इस तस्वीर को बदल सकता है। मीडिया लोगों के मस्तिष्क को नियंत्रित करता है। लोग वहीं समझते हैं जो यह समझाना चाहता है। यह समझाता है कि किस प्रकार नम्बर वन हिरोइन बनने के लिए अभिनेत्री (डर्टी पिक्चर एवं हिरोइन) उल्लंघित होती है? किस प्रकार सुपर मॉडल (फैशन) बनने की लालसा उन्हें आत्मसम्पर्ण का मार्ग दिखाती है? परन्तु मीडिया यह क्यों नहीं दिखाता कि वह (अभिनेत्री एवं सुपर मॉडल) जिसके सामने सम्पर्ण कर रही हैं वह कितना दोषी है? ‘तू नहीं कोई और सही कोई और नहीं कोई और सही’ की नीति अपना, किसी मासूम के सपनों को भुनाने का अधिकार पुरूष के पास ही क्यों सरंक्षित है। दमनकारी कूटनीतियाँ भोले मन को सरलता से फँसा अटखेलियाँ करती हैं और दोषारोपन कर छल व कपट की स्वयं की सफलता पर निर्लज भाव से इठलाती भी हैं। क्या कभी मुक्ति मिलेगी इस अन्याय से??? यह लेख कहीं न कहीं स्वयं भी पक्षपाती रहा है। ऐसा नहीं है कि समाज के समस्त पुरूष कुटिल हैं और समस्त स्त्रियाँ निर्दाेष। समाज में जिस प्रकार विभिन्न वर्गों-धर्माें-जातियों के लोग रहते हैं, उसी प्रकार विभिन्न चरित्रों के व्यक्ति भी हैं। परन्तु वर्तमान परिस्थितियाँ सौम्यता पर कुटिलता के आवरण को हावी प्रदर्शित कर रही हैं। अतएव आदर्श समाज के लिए श्रेष्ठ-तुच्छ के मध्य विभेद करने की सजगता एवं क्षमता विकसित करनी आवश्यक है। भारतवर्ष अकूत मानवीय ऊर्जा का स्वामी है। यदि इस ऊर्जा का सकारात्मक दोहन किया जाए तो विश्वपटल पर ‘सोने की चिड़िया’ का खिताब भारत पुनः प्राप्त कर लेगा।

Thursday, December 27, 2012

अब न्याय नहीं प्रतिशोध चाहिए

हाथों में बैनर, तख़्ती और चार्ट पेपर लिए आक्रोश के साथ बढ़ता जा रहा विकराल कारवाँ। सबके दिलों में धधकती ज्वाला और लबों पर तिलमिलाते अल्फ़ाज़ और इन अल्फ़ाज़ों में निहित प्रश्नों की एक लंबी श्रृंख्ला। आज़ाद भारत के बाद शायद यह दृश्य पहली बार देखने को मिला। मानो सम्पूर्ण देश फिर किसी जंग के लिए एकजुट हो उठ खड़ा हुआ हो। मानो किसी ने देश के ज़मीर पर चोट की हो। मानो निरंकुश सन्नाटे में किसी की चीख हृदय को चीर गई हो। यह एक ऐसा मंजर है जिसे न किसी नेतृत्व की आवश्यकता है और न किसी आह्नान की फिर भी इनके उद्देश्य निश्चित हैं और मंजिल स्पष्ट। यह जंग थी और है औरत के अधिकारों की, परन्तु इस बार इन अधिकारों की श्रेणी में आरक्षण अथवा संपत्ति का अधिकार सम्मिलित नहीं है वरन् यह माँग है सम्मान व सुरक्षा के अधिकार की। 16 दिसंबर को दिल्ली में घटित गैंगरेप की शर्मनाक घटना ने संपूर्ण देश की आत्मा को झकझोर दिया। दरिंदगी की समस्त सीमाओं के परे इस गैंगरेप ने महिलाओं की सुरक्षा एवं उनके सम्मान के प्रति सरकार, न्याय व्यवस्था एवं पुरूष समाज के विचारों पर कई प्रश्न चिह्न आरोपित कर दिये। राजधानी दिल्ली में अगर महिलाओं की सुरक्षा के दावे ठोकने वाली व्यवस्था पर अपराधी इस कदर तमाचा मार रहे तो अन्य राज्यों से क्या अपेक्षा की जाए! ए. सी. ऑफिस में विराजमान आलाकमान कितने गंभीर हैं सड़क की वास्तविकता के प्रति? क्या व्यवस्था परिवर्तन बलिदान के बिना अपेक्षित नहीं है? क्या इसके लिए किसी न किसी की बलि दी जानी इतनी आवश्यक है? और इस बलि के पश्चात् संवेदनशीलता के प्रमाण एवं न्याय प्राप्ति की क्या गारंटी है? शायद कुछ भी नहीं। निष्ठुर व्यवस्था से किसी भी संवेदना अथवा दया की आशा करना मूर्खता है। यह शिकायत मात्र व्यवस्था से ही नही है। हमारा समाज भी अभी तक इसी संकीर्ण मानसिकता के अधीन जीवन यापन कर रहा है। जहाँ एक ओर भ्रूण हत्या, दहेज-हत्या, ऑनर किलिंग जैसे अपराध मानव जाति को शर्मसार कर रहे है वहीं दूसरी ओर बलात्कार जैसे निर्मम कुकृत्य पशु जाति को गौरवान्वित कर रहे हैं कि वे मानव नहीं है। इस घटना के प्रति उद्वेलित जनाक्रोश प्रथम दृष्टया सिद्ध करता है कि इंसानियत जीवित है। समाज संवेदनहीनता का समर्थक नही है और हम एक जीवित समाज में विचरण कर रहे है। परन्तु यह भ्रम टूटते अधिक समय नहीं लगा। जब सारा देश इस द्रवित कर देने वाली घटना से उबल रहा है उस समय भी कुछ या कहे बहुत से ऐसे निर्लज उदाहरण समाज में व्याप्त हैं जो इस प्रकार की शर्मनाक घटनाओं के लिए महिलाओं को ही दोषी ठहरा स्वयं को दोषियों के पक्षधर सिद्ध कर रहे हैं। फेसबुक पर एक ऐसे ही प्रोफाइल की सोच ने यह विचारने पर बाधित कर दिया कि इस देशव्यापी प्रदर्शन के मूल मेें कितनी ईमानदारी, सच्चाई, मानवीय मूल्य या संवेदनशीलता निहित हैं? कहीं यह सब भेड चाल तो नहीं? या मात्र एक दिखावा? या कहे कि ऐसे प्रदर्शनों में टीवी चैनलों व समाचार-पत्रों में अपनी तस्वीर देखने का माध्यम? फेसबुक के उस प्रोफाइल ने एक बात तो पूर्णतः स्पष्ट कर दी कि घटना भले ही कितनी भी जघन्य हो जाए परन्तु वह राक्षस प्रवृत्ति को परिवर्तित या शर्मसार नहीं कर सकती। जहाँ बलात्कार पीड़िता की दर्दनाक सच्चाई आँसू लाने के लिए पर्याप्त हैं, वहीं कुछ लोगों की सोच यह भी है कि अगर शेर (पुरूष) की गुफा में बकरियाँ (महिलाएँ) जाकर नाचेंगी तो यही होगा। कितना घिनौना एवं घटिया वक्तव्य है यह! प्रश्न यह है कि ऐसे कृत्यों को अंजाम देने वालों को क्या कहा जाए- शेर या कुत्ता? और क्या महिलाएँ बकरियाँ अर्थात् जानवर हैं? क्या यह विचारधारा शिक्षित समाज के अशिक्षित मस्तिष्क की नहीं है? इस वक्तव्य से एक बात तो सिद्ध हो जाती है कि पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं से सम्मान की अपेक्षा तो दूर की बात है इंसानियत की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती। जब उनके लिए महिला का वजूद जानवर तुल्य है तो भला एक जानवर सम्मान का हकदार कैसे हो सकता है? वह तो दुत्कार के भाग्य का स्वामी है। परन्तु दयनीय स्थिति यह है कि जानवर को भी दिन में एक बार प्रेमपूर्वक पुचकार दिया जाता है और बलात्कार जैसे जघन्य कृत्यों से भी वह सुरक्षित है परन्तु दुर्भाग्यशाली महिला जाति इस स्तर पर भी हार जाती है। यह किसी एक व्यक्ति के विचार नहीं है। इस प्रकार के न जाने कितने विचार हमारे आसपास हमें मानव होने पर शर्मसार कर रहे हैं। शर्मिंदा करने वाले शब्दों का अकाल सा पड़ जाता है जब दिल्ली में हुई इस दर्दनाक बलात्कार की घटना के दो दिन बाद के एक समाचार-पत्र के एक पृष्ठ पर एक राज्य के एक ही क्षेत्र में बलात्कार की नौ घटनाएँ पढ़ने के लिए मिलती हैं। राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि एक बेटी के लिए तो न्याय की गुहार अभी न्यायव्यवस्था को जगा भी न सकी थी कि कई और बेटियाँ अपनी सिसकियों में ही दम तोड़ गई। ज़रा सोचिए देशव्यापी आंदोलन की चीखें तो इस राक्षस प्रवृत्ति को व्यत्थित कर न सकी और जब देश शान्त भाव से अपने-अपने घरों में सपने बुन रहा होता है तब इन प्रवृत्ति की तिलमिलाहट किस सीमा तक क्रूर होती होगी? इसके प्रमाण दिल्ली की उस पीड़िता के देह पर प्रदर्शित हो रहे हैं? तो क्या यह आंदोलन क्षणभंगुर है या तत्कालिक परिस्थितियों का दिखावा? यह जनसैलाब शायद न्याय व्यवस्था के कुछ पृष्ठ तो परिवर्तित कर दे परन्तु समाज में व्याप्त उस सोच को कैसे परिवर्तित किया जाए जो इन अशोभनीय घटनाओं की जननी है? क्या कोई अंत है इन सबका? कैसे लगेगा अंकुश इन सब पर? कैसे सुरक्षित अनुभव करें माँ-बेटी-बहन स्वयं को? क्या कभी ऐसा देश भारत देश हो सकेगा जब महिलाएँ अपने श्वास की ध्वनि से इसलिए न घबराए कि अगर किसी पुरूष ने उस ध्वनि को स्पर्श किया तो वह अपना वजूद खो देंगी? क्या कभी माता-पिता बेटी के जन्म पर निर्भय हो खुशियाँ मना सकेंगे? क्या कभी इस देश के महिलाएँ गर्व से कह सकेंगी कि हम उस देश की बेटियाँ हैं जहाँ हमें न केवल देवी के रूप में पूजा जाता है वरन् वास्तव में उस पूजा की सार्थकता प्रासंगिक है? क्या यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि ऐसी घटनाओं से फिर कभी यह देश लज्जित नहीं होगा? ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए किसी भी देश की कानून व्यवस्था का सख्त होना अति आवश्यक है। बलात्कार और ऐसी ही क्रूरता से लिप्त एसिड केस, ऐसी घटनाएँ हत्या से भी कहीं अधिक संगीन अपराध है। हत्या व्यक्ति को एक बार मारती है परन्तु ये घटनाएँ न केवल भुक्तभोगी को वरन् उससे सम्बन्धित प्रत्येक रिश्ते को हर पल मारती हैं और जीवन भर मारती हैं। प्रत्येक क्षण होती इस जीवित-मृत्यु की सजा मात्र सात वर्ष पर्याप्त नहीं है। देखा जाए तो मृत्युदंड भी इस अपराध के सम्मुख तुच्छ प्रतीत होता है। कई ऐसे देश हैं जहाँ इस प्रकार की घटनाओं की सजा स्वरूप अपराधी को नपुंसक बना दिया जाता है। शायद यह सजा उसे उसके अपराध का अहसास तो दिला सके परन्तु अगर भुक्तभोगी की सिसकियों से पूछा जाए तो वह कभी इस सजा को उस खौफ के लिए पर्याप्त नहीं मानेगी जो उसके मन में घर कर जाता है। उस अविश्वास को इस सजा से कभी नहीं पुनः प्राप्त कर सकेगी जो समाज के प्रति उसके मस्तिष्क में समा जाता है। उस दर्द की भरपाई यह सजा कभी नहीं कर पाएगी जो उसके कोमल अंगों को मिला है। और इस सजा की तसल्ली उसके आत्मविश्वास के लिए कभी पर्याप्त नहीं हो पाएगी। इस प्रकार के अपराध पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ तालिबानी तरीके ही कारगार साबित हो सकते हैं। ऐसे अपराधियों को ज़मीन में आधा दबाकर पत्थरों से मारा जाना चाहिए जिससे प्रत्येक पत्थर इस प्रकार की मंशा रखने वालों तक की रूह को कँपा सके। जिससे कोई भी दुष्ट विचार उत्पन्न होने से पहले ही अपने अंजाम को सोचने पर मजबूर हो सके। सच पूछिए तो महिलाओं को संविधान में लिखित अधिकारों में संपत्ति के अधिकार देने से पूर्व सम्मान का अधिकार दिया जाना चाहिए। उन्हें सुरक्षा के अधिकार की आवश्यकता है। खुली हवा में स्वतंत्रतापूर्वक निर्भिक हो मुस्कराने के अधिकार की आवश्यकता है। अगर ये अधिकार उन्हें प्राप्त हो जाए तो असमानता स्वतः समाप्त हो जाएगी। लैंगिक असमानता का प्रश्न अस्तित्वहीन हो जाएगा। इसके लिए आवश्यकता है मानसिक स्तर की परिधि को विस्तृत करने की। संकीर्णता को समाप्त कर स्वतंत्र सोच के विकास की। अकेली महिला को देखकर जो आकर्षण पुरूष महसूस करते हैं उसके पल्लवित होने से पूर्व उस महिला के स्थान पर अपने घर की महिला को रखकर विचार करें। क्या आप अपने परिजनों के साथ किसी प्रकार का अशुभ होने की कल्पना करना चाहेंगे? यदि नहीं, तो त्याग दीजिए प्रत्येक उस विचार को जो दूसरों के घर की बेटियों के प्रति उमड़ता है। वैचारिक शुद्धता एवं पवित्रता ही इस समस्या का समाधान हो सकती है। ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में अच्छे संस्कार और अच्छी संस्कृति का विकास करे। उन्हें प्रत्येक जाति (स्त्री व पुरूष) का सम्मान करने की शिक्षा दें। नैतिक मूल्यों का हृास किसी भी समाज के अंत का संकेत है और वर्तमान परिस्थितियाँ भारत के संदर्भ में वास्तव में चिन्तनीय हैं।

Sunday, August 26, 2012

बेटी बचाओ अभियान में जोड़ें एक नया अध्याय


कितना तड़पी होगी वो! क्या वो इसका मतलब भी समझती होगी? मानसिक एवं शारीरिक रूप से शोषित होती यह बच्ची, जब माँ बनने के अर्थ को समझ आने की अवस्था में होगी, तब उस सुंदर अहसास से परे घृणित भाव से भरी होगी और घिरी होगी प्रश्नों के जंजाल में कि क्यों उसके माता-पिता ने ही उसके विश्वास को तार-तार किया? क्यों नहीं कर पाये वे उसकी रक्षा? क्यों ईश्वर उसकी किस्मत लिखते समय इतना निष्ठुर हो गया? कहाँ रहा नौ महीने ‘लड़कियों का रक्षक समाज’? क्या उसकी पीड़ा की चीख़ किसी के कानों में नहीं पड़ी? क्या इतने दिन किसी की दृष्टि उसके उभारों से प्रश्न न कर सकी? क्या किसी के मन में उसके लिए करूणा नहीं उमड़ी? यहाँ तक कि उसके अपने माँ-बाप के मन में भी नही! वह तेरह वर्ष की उम्र में एक बच्ची की माँ बन गई। अभी तो वह खुद माँ की गोद में सिर रख दुलार के हाथ की प्रतीक्षा कर रही थी कि स्वयं उसकी गोद से किलकारियों की आवाजें आने लगी! कौन है इसका जिम्मेदार? वे जो उसके संरक्षक हैं या वह जो अपने हसरतें पूरी कर चला गया? क्या एक बार भी उन बाल अंगों पर तरस नहीं आया उसे? अब क्या? क्या अब उस मासूम को उन हाथों की कठपुतली बनने के लिए छोड़ देना चाहिये? क्या उनके साथ उसका व उसकी बच्ची का भविष्य सुरक्षित है? क्या गारंटी है कि भविष्य में वह बच्ची व उसकी बच्ची उन संरक्षकों के लिए कमाई का साधन नहीं बनेगी? क्या आयेगा कोई उन दोनों की रक्षा के लिए? और इन सबके साथ-साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न-चिन्हः आखि़र कब तक चलेंगी ये कहानियाँ? और कितनी लम्बी होगी यह कतार? ज़रा कचौटिये अपनी मृत भावनाओं को, शायद कोई हल निकल आये और बचपन की मीठी यादें ज़हरीले भाग्य से मुक्त हो जायें।

Thursday, May 10, 2012

लील गये दर्शक, ‘पाठक’


समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ की सूचनाओं पर यथासंभव प्रतिक्रिया करने के पश्चात् जैसे ही दूसरे पृष्ठ की ओर रूख किया तो झटके के साथ अखबार बंद हो गया और मुँह से निकला...............आ..........ऊ.........च। यह आऊच तो सामने बैठे श्रीमान् का ध्यान उस पृष्ठ से हटाने के लिए था जिसे खोलते ही पाठक शर्मींदा हो जाये। श्रीमान् तो मान बैठे कि हमें हो शारीरिक क्षति हुई है, पर कैसे बतायंे, यह तो मानसिक आघात था। ऐसे झटके हर शरीफ़ को आजकल के अख़बार खोलते ही लगते हैं। हर दूसरे या तीसरे पृष्ठ पर ऐसी तस्वीरें चस्पा की जाती हैं, जिन्हंे देखकर आँखें शर्म से झूक जायें। टी0वी0, इंटरनेट पर वही तस्वीरें अगर बच्चे देखें तो निश्चित रूप से अश्लील तस्वीरें देखने के जुर्म में माता-पिता से मार खायेंगे। इसी परेशानी का हल शायद हमारे आधुनिक कहे जाने वाले समाचार-पत्रों ने निकाल दिया और माता-पिता व बच्चों के लिए सार्वजनिक रूप से गर्म मसाला परोस दिया। देखो और लज्जा त्यागो। हुआ भी यही कुछ दिनों तक तो हमने अखबार के पन्ने संभल-संभल कर खोलना शुरू किया, पर आखिर कब तक यह सब किया जा सकता था? बहरहाल हम ही बेशर्म हो गये। बच्चों के सम्मुख तो यह शर्म खुल गई है बस कुछ चिर-परिचित ऐसे हैं जिनके के लिए अभी कुछ और अभ्यास की आवश्यकता है। कुछ अख़बारों ने तो इसे परम्परा बना दिया है। मानो सांस्कृतिक प्रतीक हो गई हैं ये तस्वीरें। अखबार खोला और पाश्चात्य संस्कृति की दर्शन कराती नग्न देवियाँ निर्लज मुद्राओं में आपके सम्मुख प्रस्तुत हो गई। स्थिति यह है कि हमारे समाचार-पत्रों के ‘पाठक कम दर्शक ज्यादा’ हो गये हैं। समाचार-पत्रों को हमने अपनी नेक सलाह बिलकुल मुफ्त देनी चाही। पर यही गलती हो गई। बाजार के चार नये प्रत्यय समझकर हम अपना सा मुँह लेकर लौटे। यह मार्केटिंग का युग है। यहाँ वही छापा जाता है जो बिकता है और इसमें हमारा क्या दोष आप लोग पढ़ना ही....... मतलब देखना ही यह चाहते हो। आप देखना बंद कर दो, हम छापना बंद कर देंगे। बात तो कुछ हद तक सही है। पत्रकारिता दुकानदारी जो हो गई है। पर उलझन यह है कि कोठे पर बैठी तवायफ कहती है कि मैं पेट के लिए ज़िस्म बेचती हूँ, खरीदने वाले हैं इसलिए बिकती हूँ। मेरी मजबूरी ने मुझे कुलटा बना दिया पर वो शरीफ़ कैसे जिनके शौक ने मुझे यहाँ पहुँचा दिया? तो क्या वास्तव में हम पाठक समाचार-पत्रों को यह दिशा प्रदान कर रहे हैं? या समाचार-पत्रों ने नग्नता रूपी चरस की लत से पाठकों को दर्शक बना दिया! निश्चित परिणाम निकालना अत्यन्त कठिन है परन्तु एक बात स्पष्ट है कि दोनांे ही कारण सामाजिक विकृति को बढ़वा अवश्य दे रहे हैं।

Thursday, April 26, 2012

ना कोंसो अब हमें

i-next में उठाये गये प्रश्न ‘तो क्या लड़कियां ही हैं रेप की जिम्मेदार?’ के मुख्य दो कारण हैं- एक, कि यह प्रश्न वास्तव में जानना चाहता है कि रेप का वास्तविक कारण है क्या? दूसरा, इस प्रकार की शर्मनाक एवं दुखद घटनाओं के प्रति आने वाले वे असंवेदनशील संवाद जो उच्च पदों पर विराजमान शिरोमणियों के मुख से प्रकट हुए। डिप्टी कमिश्नर, डीजीपी, दिल्ली पुलिस कमिश्नर, सीएम दिल्ली एवं दिल्ली पुलिस, सभी के अनुसार लड़कियां अपने साथ हुई किसी भी दुर्घटना के लिए स्वतः जिम्मेदार है। किसी के अनुसार लड़कियों का पहनावा दोषी है तो किसी के अनुसार असमय उनका असुरक्षित यात्रा अथवा नौकरी करना। कितनी विचित्र स्थिति है कि एसी आफिस में बैठने वाले अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए ‘चोरी और ऊपर से सीना जोरी’ कर रहे है! पुलिस एवं सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा के भाव का अहसास कराना है। ऐसे में ये उल्टी नसीहत उन्हें नागरिकों द्वारा कष्ट प्रदान न किये जाने का आदेश दे रही है। उन्नति की दौड़ में अपेक्षाओं से अधिक परिणाम प्रस्तुत कर अपने वजूद का लौहा मनाने वाली महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर कैसे घर बैठकर आलू-गोभी काटने का हुक्म सुनाया जा सकता है? और इस प्रकार कैद महिलाओं की आन्तरिक सुरक्षा की क्या गारंटी? 15 मार्च 2012 को अमर उजाला में प्रकाशित समाचार ‘ नौ साल की उम्र में पहला एबार्शन’ लड़कियों की घरेलु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह आरोपित करने के साथ-साथ दी जाने वाली नसीहतों को शर्मिंदा भी करता है। नाबालिकों के साथ आये दिन होने वाले दुर्व्यवहारों के लिए हमारे इन आलाकमानों के पास क्या नसीहत है? ऑफिस में बैठकर सुझावों एवं सलाहों के भँवरों में आम आदमी की सोच को गुमराह करने से बेहतर है एक सटीक रणनीति का निर्माण किया जाए और एक ऐसा समाधान प्रस्तुत किया जाये जिससे वास्तव में लड़कियों को सुरक्षित संरक्षण प्राप्त हो सके और वे अपने सपनों का आकाश पा सकें।