Thursday, July 20, 2017

चलो ढूँढे एक नया घर

आंटी जी.............. आती हूँ, रूको ज़रा.......... हमें तो तुम्हारा कोई सुख नहीं है। बस रात को सोने के लिए आती हो। ( दरवाजा खोलते हुए आंटी ने मुँह पिचकाते हुए कहा।) आंटी क्या करें नौकरी की मजबूरी ही ऐसी है। सुनो जी! एक नया किराये का मकान तलाश लो। अब लगता है यहाँ का समय भी पूरा हो गया। छः महीने भी नहीं हुए और.......... क्यों क्या हुआ? कुछ कहा आंटी ने? हम्म्म्म............ कह रही थी कि उन्हें तो हमारा कोई सुख नहीं। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि किरायदार से मकान-मालिक कौन-सा सुख चाहते हैं? हम किराया समय से पहले दे देते हैं। घर मंे कोई बच्चा नहीं, जो दीवारों का पोस्टर बनाए। कोई शोर-शराबा, तोड़-फोड़ नहीं। जाने-पहचाने शरीफ़ लोग हैं हम। कब्जे़ का कोई डर नहीं। सुरक्षा की कोई परेशानी नहीं। जैसा वे कहते हैं अपने सीमित समय से समय निकालकर भी वह सब कर देते हैं। फिर भला और कौन-सा सुख रह जाता है। आप ही बताइए मुझे? क्या केवल पूरे दिन घर में रहने भर से सुख प्राप्त हो जाएगा। अगर मैं अपने कमरे मंे रहूँ और इन्हें बिलकुल बात न करूँ तो क्या इन्हें सुख मिल जाएगा। किराया समय पर न दूँ और शोर मचा-मचाकर जीना दूभर कर दूँ तो इन्हें अथाह सुख की प्राप्ति हो जाएगी। सुख की परिभाषा प्रत्येक व्यक्ति के लिए भिन्न होती है। पता नहीं इनकी परिभाषा में कौन-कौन से कठिन शब्द हैं जो मेरी तो समझ से बाहर हैं। आपको याद है पहले वाली मकान-मालकिन ने कितना तंग किया था मकान से निकालने के लिए। सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा परन्तु काम ऐसे किए कि हम भागते नज़र आए। क्योें करते हैं ये लोग ऐसे? क्या हमें कहीं रहने का अधिकार नहीं। किरायदार का अर्थ है किराया देकर रहने वाले। फिर भला और किस प्रकार की उम्मीदें लगाए रहते हैं ये! हाँ! ये तो है। पर अचानक हुआ क्या उन्हें? तुमसे कोई बात हुई क्या? नहीं-नहीं। मैं जब रात को आई और दरवाजा खोलने के लिए उन्हें आवाज़ लगाई तो बस अंदर से वो यहीं बोलती आई थी। अब आप ही बताइये सुबह हम दोनों साढ़े चार बजे साथ ही तो निकले थे। उसके बाद रात को आठ बजे मैं घर आई। इस बीच जब हम मिले ही नही तो भला मैंने क्या कह दिया उन्हें! हाँ! लेकिन कल उनकी कुछ सहेलियाँ आई थी और मैं किसी काम से घर आकर सामान लेकर चली गई थी तो जरूर उन्होंने कुछ कहा होगा। मुझे उनके चेहरे के हाव-भाव तभी खटक गए थे। आंटी बहुत अच्छी हैं परन्तु...................... ‘‘तुम्हें तो अपने किरायदारों का कोई सुख नहीं बहन। ये तो घर में रहते ही नही। जब देखो बाहर ही रहते हैं। किसी परेशानी में तुम तो इन्हें बुला भी नहीं सकती। नौकरी-पेशा वालों को तो किरायदार ना ही रखो तो अच्छा है।’’ आंटी की सहेलियों के अनकहे भावों में ये शब्द स्पष्ट थे। देखो तुम परेशान मत होओ और उनकी तरफ से भी सोचो। हम अब तक जितने मकानों में रहे हैं वहाँ केवल बुजुर्ग पति-पत्नी रहते थे। इस मोहल्ले में भी जितने घर हैं एक या दो को छोड़कर सभी में मात्र बुजुर्ग ही रहते हैं। स्थिति समझने की कोशिश करो। ये ही हमारा भी भविष्य है। इन सबके बच्चे इन्हें किसी भी परिस्थितिवश छोड़कर इनसे अलग रह रहे हैं। अपने सपनों के घर जिसे इन्होंने ताउम्र सजाया है, उसमें ये बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। अपने साथ किसी प्रकार की अनहोनी होने के भय से ये अपनी सुरक्षा के लिए किरायदार रखते हैं। वहीं दूसरी ओर जिन कारणों से इनके बच्चे इनसे दूर हैं, उन्हीं कारणों से हम स्वयं भी तो अपने माता-पिता से दूर हैं। यह समाज की अस्त-व्यस्त सी अवस्था है और गंभीर भी। समझ नहीं आता इस प्रकार बढ़ते समाज की नई तस्वीर क्या होगी!!! परिवार बिखर रहे हैं और साथ ही अकेलेपन का आसरा परायों में अपनापन तलाशकर ढूँढा जा रहा है। असुरक्षा की भावना से लिप्त निगाहें अनजाने परिवार से आशा करती हैं। हमारी समस्या एवं स्थिति वही है जो आज इनके बच्चों की है। वे भी किसी अनजाने शहर में नौकरी की मजबूरी में अपने माता-पिता से दूर उनकी चिंता करते हुए किसी मकान को तलाश रहे होंगे। उन्हें भी कोई मकान-मालिक यह सोचकर मकान नहीं देना चाह रहा होगा कि नौकरी-पेशा लोग हैं इनके घर की सुरक्षा ही हमें करनी पडे़गी। एक विचित्र-सा, अकल्पनीय, दिशाहीन समाज परन्तु वास्तविकता यही है? हम्म्म्म..... इसका अन्तिम रूप क्या होगा? आपको क्या लगता है? अन्तिम रूप का तो कोई अंदाजा नहीं परन्तु हल दो नज़र आते हैं। या तो ‘ओल्ड एज होम’ की संख्या में वृद्धि हो जायेगी या बुजुर्गां को अपने-अपने सपनों के घर का मोह त्यागकर बच्चों के साथ स्थानान्तरित होना होगा। यह प्रत्येक व्यक्ति अथवा परिवार का व्यक्तिगत् निर्णय होगा कि वह किसे प्रमुखता देता है। बहरहाल कुछ भी हो दोनों ही स्थितियाँ दुःखदायी हैं। परन्तु बढ़ती तकनीकी ने प्रतिस्पर्धा की गति के आवेग को अत्यधिक तीव्र कर दिया है। उससे कोई भी अछूता नहीं रह सकता। सभी को इस अंधी दौड़ में दौड़ते रहने की बाध्यता है। समस्या यह है कि दौड़ में सभी की गति भिन्न-भिन्न है। जिसके कारण हमारे कई अपने पीछे छूट जाते हैं और कई बहुत आगे निकल जाते हैं। उनसे बिछड़ने का अहसास हमें तब होता है जब हम खुशी और ग़म के अवसरों पर स्वयं को अकेला पाते हैं। आगे आने वाली तो प्रत्येक पीढ़ी पारिवारिक सुखों से वंचित ही रह जायेगी। उन्नति एवं परिवार वैकल्पिक हो जाएँगे। किसी एक का चयन कुंठा का जनक बन जाएगा। आज जिस बहुआयामी तरक्की के प्रति हम लालायित हैं, कल उसी पर हमें पछतावा होगा। परन्तु वर्तमान में कोई और विकल्प भी तो नही है। खैर! चलो एक नये मकान की तलाश करते हैं। हमारी पीढ़ी का सुख तो न हमारे माता-पिता को है, न हमारे बच्चों को और न स्वयं हमें ही।

अपराधबोध

सभी अपने-अपने स्थान पर विराजमान अपने-अपने कार्यों में इस प्रकार लीन थे कि मानो उन्हें अपने कार्य से अधिक किसी भी प्रलोभन के प्रति कोई रूचि न हो। अत्यधिक कर्मठ। जबकि वास्तव में आज किसी का भी मन अपने किसी भी कार्य में बिलकुल नहीं लग रहा था। सभी की श्रवणेंद्रियाँ उस दरवाजे पर केंद्रित थी जो किसी भी क्षण खुल सकता था और जिसके खुलने की प्रतीक्षा पिछले एक घण्टे से सभी उत्कंठित कर रही थी। इस पसरे सन्नाटे एवं भ्रामक मुद्राओं के पीछे कोई गंभीर कारण तो अवश्य है। तभी यकायक दरवाजे के पट खुलते हैं और समस्त दृष्टियाँ अपने-अपने महत्त्वपूर्ण कार्यों से विचलित हो, उस पर टिक जाती हैं। उसके चेहरे के भावों की विभिन्न व्याख्यायें व्यक्तिगत् विभिन्नताओं का स्पष्ट प्रतिमान प्रतीत हो रहीं थीं। किसी को भी किसी भी प्रकार के सकारात्मक परिणाम की आशा न थी। परन्तु ‘उम्मीद’ किसी चमत्कार की प्रतीक्षा में थी। उसके मुख पर तनाव निःसंदेह स्पष्ट रूप से दस्तक दिए हुए था। ऑफ़िस के प्रथम दिन से ही वह अंतर्मुखी थी, बिलकुल मिलनसार नहीं। किसी से अधिक बातचीत न करना और अपने कार्यों एवं चुनौतियों को गंभीरता से लेते हुए दक्षता से करना, यही उसके कार्य करने का तरीका था और कदाचित् ज़िंदगी जीने का भी। उसकी यही कर्तव्यपरायणता कुछ चाटुकारों को रास नहीं आती थी परन्तु फिर भी वह किसी की परवाह किए बिना अपनी दिनचर्या का पालन करती रहती। आज कर्तव्यनिष्ठा-ईमानदारी और खुशामदी-बेइमानी के मध्य एक अकथित जंग थी। उसके मद्धम-मद्धम बढ़ते कदम हमारी हृदयगति में आवेग उत्पन्न कर रहे थे। हमारे सहकर्मियों के साथ हमारा व्यवहार दो प्रकार की भावनाओं से ओत-प्रोत होता है, एक- प्रतिस्पर्धा, दूसरी- ईर्ष्या। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा तक हमारे संबंधों का स्वास्थ्य भी स्वस्थ रहता है। कुछ छुट-पुट घटनाओं को छोड़कर हम अपने प्रतियोगी के साथ अच्छा व उपयोगी समय व्यतीत करते हैं। परन्तु यदि भावनायें ईर्ष्या में लिप्त हों तो स्थिति अधिकतर गंभीर-विकराल हो जाती है जिसके परिणाम अधिकतर सरल, मेहनती, ईमानदार व कर्मठ व्यक्ति को ही भुगतने पड़ते हैं। अक्सर कुटिलता सरलता पर हावी हो जाती है। ऐसा ही कुछ हुआ मीरा के साथ भी। पिछले कुछ दिनों में ऑफ़िस में अनेक नवीन नियुक्तियाँ र्हुइं। नया खून, नयी उमंग, नया जोश और जनून तथा जल्दी सफ़ल होने का चरसरूपी नशा। कुछ लोग वास्तव में उन पदों के योग्य थे परन्तु कुछ उन पदों को हथियाने की योग्यता में माहिर थे और अपनी इस कला का भरपूर दुरूपयोग भी कर रहे थे। इसी कारण वास्तविक योग्यता का आत्मविश्वास जीर्ण-शीर्ण हो रहा था और ऑफ़िस कर्मस्थल न रहकर युद्ध का मैदान बनता जा रहा था। हालाँकि इस घटना ने ऑफ़िस को दो वर्गों में विभाजित कर दिया था। एक समूह कर्मठता का और दूसरा चापलूसों का। परन्तु वह पूर्णतः तठस्थ थी। किसी भी जमात में सम्मिलित न हो मात्र अपने कार्यों पर केद्रिंत रहनेे वाली कारिंदी। उसका यही विरला-विलक्षण व्यक्तित्व अकसर दूसरों में उसके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न कर देता था और उसकी बरख़ास्तगी इसी का परिणाम थी। कुछ दिन पूर्व नये चेयरमैन ने कार्यालय में काम करने के संबंध में कई नये निर्देश सूचना-पट पर चस्पा कराये जिनमें से सर्वाधिक जोर किसी भी कर्मचारी द्वारा ऑफ़िस के समय में फ़ोन का प्रयोग न करने पर था। आवश्यक कार्याें के लिए मात्र ऑफ़िस के फ़ोन ही प्रयोग किए जा सकेंगें, जिसके लिए प्रत्येक की सीट पर इंटरकोम की सुविधा उपलब्ध करा दी गई थी। सभी को अपने फ़ोन ऑफ़िस के बाहर कंट्रोल रूम में ही जमा करके जाना होगा। यद्यपि सभी ने इस आदेश का भरसक विरोध किया परन्तु चापलूसों के एक बड़े समूह ने इस आदेश को अम्ल में लाना शुरू कर दिया और चेयरमैन साहब का सहयोग किया। सहकर्मियों द्वारा उनकी भर्त्सना का स्पष्टीकरण वे कुछ इस प्रकार देते- ‘‘हम यहाँ काम करने आते हैं और अगर हम अपना काम अच्छे से कर रहे हैं तो हमारा फोन कहीं भी रहे क्या फ़र्क पड़ता है!’’ सत्य ही कहा। उन्हें भला क्या फ़र्क पडेगा। फ़र्क तो उन्हें पड़ता है जो वास्तव में ईमानदारी से अपना काम कर रहे हैं। जो बेइमानी में माहिर हैं, वे तो नियमों को तोड़ने का हुनर जानते हैं। हुआ भी यही। कर्मठ लोग कुढ़ते हुए नियमों का पालन कर रहे थे, बेइमान निर्लजता से मनमानी कर रहे थे। साथ ही चुगली रस का आस्वादन कर अधिकारियों के पसंदीदा व्यक्तियों की जमात में भी शामिल थे। ऑफ़िस में घुटन बहुत बढ़ गई थी। सभी का मन व्यथित था यहाँ काम करने में। अति हर चीज की बुरी होती है और बुराई का अंत करने वाला कोई न कोई निर्भीक नेता अवश्य कहीं से भी निकल आता है। हुआ भी यही। इस नियम को सर्वप्रथम खुली चुनौती दी मीरा ने। किसी को भी इसकी आशा न थी। सभी की उम्मीद से परे था यह सब। परन्तु उसने ऐसा ही किया। वह फ़ोन जबरन ऑफ़िस में लेकर आने लगी। ऐसा भी नही है कि वह सारा समय फ़ोन पर ही व्यतीत करती थी। यदा-कदा उसे फोन का प्रयोग करते देखा गया होगा, वह भी अति लघु वार्ता के साथ। उस दिन उसके घर से कोई महत्त्वपूर्ण फ़ोन आया। उसे सुनती हुई वह कुछ विचलित भी प्रतीत हो रही थी, तभी न जाने कहाँ से अचानक चेयरमैन साहब उसके सामने आ खड़े हुए। सभी हक्के-बक्के रह गए। वे अचानक से ऐसे इतने बड़े ऑफिस में.................... नहीं! अवश्य ही किसी ने उन्हें सूचित किया था। वे मौन रहे। मीरा को भी उन्होंने कुछ नहीं कहा। मात्र कुछ क्षण घूरा और फिर चले गए। हम सबने सोचा कदाचित् बला टल गई और पूरा दिन कुछ खुसर-पुसर के साथ बीत गया। लाज़िमी है मीरा तनाव में थी। पहली बार उसे बिना कुछ काम किए हथेलियों से मुँह ढके बैठे देखा। बहुत परेशान थी वह आज। अगले दिन सुबह रिसेप्शन पर ही मीरा को रोककर एक लिफ़ाफ़ा दिया गया। हम सभी ने सोचा, अवश्य ही उसे ‘कारण बताओ नोटिस’ दिया गया होगा। पास ही खड़ी उसकी एक सहकर्मी तिरछी निगाहों से उसके उस लिफ़ाफे़ में से निकले नोटिस को पढ़ने का प्रयास कर रही थी। हमारी नज़रंे लिफ़ाफ़े और मीरा के चेहरे से अधिक पास खड़ी सहकर्मी की भाव-भंगिमा पर थी। अचानक निकली एक लंबी चीख ‘नो........’ ने सभी के सम्मोहन को भंग कर दिया। नहीं यार! ये सही नही है। ऐसा कैसे कर सकते हैं!! पहले कोई नोटिस तो दिया जाता है। नो!!! ये गलत है। हमने आश्चर्य से पूछा क्या हुआ मीरा? अवाक् खड़ी मीरा कुछ न बोल सकी। हमने वह पत्र उसके हाथ से लेकर पढ़ा। मीरा को नौकरी से निकाल दिया गया था। अनुशासनहीनता के आरोप के साथ। हम पत्र पढ़ ही रहे थे कि मीरा ने तपाक् से वह हमारे हाथ से छीन लिया और दामिनी की भाँति चेयरमैन के ऑफ़िस की ओर बढ़ गई। तब से एक घण्टा हो गया। हम सबकी नज़र उस दरवाजे पर लगी थी जहाँ चेयरमैन और मीरा के बीच सघन वार्तालाप चल रही थी। किसी को नहीं पता वहाँ क्या हुआ? बस मीरा के चेहरे के भाव और हमारा अनुमान!!!!! मीरा चली गई। शायद चेयरमैन ने उसकी बात नहीं सुनी। शायद मीरा इस ऑफ़िस में अब कभी नहीं आएगी। यह एक निराशाभरा दिन था और चर्चाओं का सिलसिला जारी था। अगले दिन सभी को ई-मेल के माध्यम से एक बजे की मीटिंग की सूचना प्राप्त हुई। सभी के बीच अजीब-सा भय व्याप्त था। कुछ व्यक्ति मीरा को भी कोस रहे थे कि वह हमारे लिए गड्ढ़ा खोद गई। क्या ज़रूरत थी उसे ऑफ़िस में फ़ोन का प्रयोग करने की! मीटिंग रूम के अंदर व्याकुल हम सभी चेयरमैन का इंतज़ार कर रहे थे कि तभी मीरा और चेयरमैन के एक-साथ प्रवेश ने सभी को चौंका दिया। मीरा ने चेयरमैन के पीछे से घूमते हुए हम सभी के सम्मुख अपना स्थान ग्रहण किया। सभी के कंठ में समान स्वर थे- ‘ये क्या हुआ?’ चेयरमैन ने माइक संभालते हुए बोलना शुरू किया- आप सभी का स्वागत है। आप लोग सोच रहे होंगे कि अचानक सभी को यहाँ क्यों बुलाया गया? और मीरा यहाँ क्या कर रही है? जी हाँ! आपके भाव मैं अच्छे से पढ़ पा रहा हूँ। कल जो घटना इस ऑफ़िस में घटित हुई उसके लिए मीरा को पदच्युत कर दिया गया और ऐसा भी नहीं कि उसका पुनः इस आफ़िस में किसी भी प्रकार का स्वागत किया जा रहा है। बस कल हुई हमारी एक घण्टे की वार्ता उसकी बखऱ्ास्तगी वापसी के लिए न होकर इस मीटिंग के लिए हुई थी। मीरा चाहती थी कि वह अपनी बात सबके सामने इस मीटिंग के माध्यम से रखे। मुझे स्वयं यह अत्यन्त विचित्र लगा। मैं सोच रहा था कि इतनी मेहनती लड़की ने इस प्रकार का व्यवहार क्यों किया! साथ ही वह अपनी बर्ख़ास्तगी के लिए संघर्ष न कर इस मीटिंग के लिए हठ कर रही है। सच कहूँ तो मैं मीरा को सुनने के लिए बहुत उत्सुक हूँ और भयभीत भी कि कहीं मीरा हम सभी का समय तो बर्बाद नहीं कर देगी!! बहरहाल मैं माइक मीरा को देता हूँ। आओ मीरा। मीरा ने माइक संभालते हुए सभी का अभिवादन किया और चेयरमैन सर को इस अवसर के लिए धन्यवाद दिया। मीरा ने कहना शुरू किया- चेयरमैन सर के शब्दों को ध्यान में रखते हुए मैं कोशिश करूँगी कि आपका समय नष्ट न हो और सीधे ही अपनी बात कहना शुरू करती हूँ। इस मीटिंग के माध्यम से मैं आपको बताना चाहती हूँ कि मैंने फ़ोन का प्रयोग क्यों किया। बात तीन वर्ष पूर्व की है। मैं अपने कार्य में बहुत अधिक लीन और व्यस्त थी। तभी एक फ़ोन बजता है। नम्बर देखा तो सुधीर का फोन। मैंने फ़ोन नहीं उठाया और अपने काम में पुनः लीन हो गई। परन्तु फ़ोन फिर बजा। मैंने फ़ोन उठाते ही बिना एक शब्द सुने बोला, ‘‘सुधीर! अभी व्यस्त हूँ, तुम्हें बाद में फ़ोन करती हूँ।’’ सुधीर!!! जिससे न कोई खून का रिश्ता था और न ही सामाजिक भय से जबरन बनाया गया भाई रूपी बंधन। बस व्यवहार और दिल का रिश्ता था उससे। मेरी माँ को मम्मी बुलाता था वह। मैं न दोस्त थी न बहन और न ही प्रेमिका। नामविहीन एक-दूसरे के प्रति सम्मान एवं आदर-भाव का रिश्ता। हमें जब एक-दूसरे की सहायता की आवश्यकता होती तो कभी-कभार बात हो जाती थी। उसका बैंक में चयन हुआ तो मम्मी का आशीर्वाद लेने व मिठाई देने वह आया था। उस दिन उसका फ़ोन कई महीनों बाद आया था। काम से निर्वृत होकर मैंने सुधीर को फ़ोन किया। उसका फ़ोन नहीं लगा। उसके दूसरे नम्बर पर मिलाया वह भी नहीं मिला। मैंने एक-दो बार प्रयास और किया और फिर भूल गई। सात महीनों बाद एक कॉमन मित्र के माध्यम से मुझे ज्ञात हुआ कि सुधीर इस दुनिया में नही रहा। उसने आत्महत्या कर ली। लगभग सात माह पूर्व हमारे ही एक अन्य मित्र ने उसके मृत शरीर को पोस्मार्टम के लिए जाते हुए देखा। मैं सन्न रह गई। लगभग सात माह पूर्व, जब उसने मुझे फ़ोन किया था, वह मुझसे अपनी परेशानी साँझा करना चाहता था। वह मुझसे कुछ कहना चाहता था। वह बच सकता था यदि मैंने काम को इतनी प्रमुखता न दी होती। बस एक बार उससे यह पूछ लेती कि सुधीर सब ठीक है न। बस एक बार उसे हैलो के बाद बोलने का मौका दे देती। बस एक बार............. यह एक मौका फिर कभी नहीं मिला। वह मर गया। मेरी वजह से। मेरी काम के प्रति धुन की वजह से और कदाचित् मेरी महत्त्वकाँक्षाओं की वजह से। हम सभी इतने भौतिकवादी एवं आत्मनिष्ठ हो गए हैं कि स्वार्थपूर्ति वाले संदर्भों के लिए हमारे पास समय है अन्यथा अन्य किसी व्यक्ति, भावना अथवा संबंध के लिए हम अत्यधिक व्यस्त हैं। कितनी ही बार हमारे परिजन हमें जरूरी सूचना देने के लिए तड़पते रह जाते हैं परन्तु फ़ोन पर प्रतिबंध के कारण हम किसी अपने को खो देते हैं। वास्तव में जिनके लिए यह प्रतिबंध है वे सभी इसका बेहिचक एवं निर्भीकता से प्रयोग कर रहे हैं। परेशान होते हैं तो सच्चे, ईमानदार एवं कर्तव्यनिष्ठ लोग। मैं आज भी सुधीर की ‘गैर-इरादतन हत्या’ के अपराधबोध से ग्रसित हूँ। ऐसा कोई दिन नहीं जब वह मेरी स्मृति में न आता हो। ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं वापस फिर उसी पल में लौटकर उसका फ़ोन सुनना न चाहती हूँ। ऐसा कोई दिन नहीं जब मैं उसे पुनः जीवित न करना चाहती हूँ। मैं फिर किसी और हत्या का भार वहन करने की स्थिति में नहीं हूँ इसलिए मैं सहर्ष आपकी संस्था छोड़ने के लिए तैयार हूँ। आशा करती हूँ कि मैंने आपका अमूल्य समय नष्ट नहीं किया होगा। धन्यवाद। (अपनी बात कहकर मीरा चली गई। सब विचारशून्य हुए स्तब्ध बैठे रह गए।) (यह मात्र कहानी न होकर मेरे स्वयं के साथ घटित सत्य घटना है। निवेदन है कि आप सब भी इस घटना के सबक से प्रेरित हो अपने किसी प्रियजन को आहत होने से बचा लें।)

Tuesday, March 7, 2017

डियर जिं़दगीः डियर बच्चे

रात के एक बजे का सन्नाटा और ‘‘डियर जिं़दगी’’ का अन्तिम दृश्य। एक अनोखी, भिन्न एवं संवेदनशील विषयक फ़िल्म। अत्यन्त खास। ‘खास’ इसलिए कि यह कहीं न कहीं, किसी न किसी प्रकार से हम सबकी ज़िंदगियों एवं जीवन-शैलियों से संबंधित है। कदाचित इसीलिए इसकी कहानी दिल को न केवल छू गई अलबत्ता दिल को ‘लग’ गई। बाध्य कर दिया इस फ़िल्म ने रात के एक बजे लिखने के लिए। अनिंद्रा ने प्रातःकाल की प्रतीक्षा की अनुमति प्रदान नहीं की। भोर का विलम्ब कहीं भावनाएँ की आँधी के वेग को कम न कर दे। एक भी संवेदना अलिखित न रह जाए। इस भगौडे़ वक्त का भी तो भरोसा नहीं। इस विषय पर आरंभ करने से पूर्व फ़िल्म की निदेशिका ‘गौरी शिंदे’ को बहुत-बहुत धन्यवाद एवं शुभकामनाएँ, जिन्होंने इतने संजीदा विषय को इतनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया। समस्त अभिनेता एवं अभिनेत्रियों को बधाई। मुख्यतः आलिया भट्ट। आलिया से बेहतर इस भूमिका को कोई और अभिनेत्री निभा ही नही सकती थी। बहरहाल, पुनः फ़िल्म के विषय की ओर ध्यानस्थ होते हुए। ‘‘बच्चे’’, ढाई अक्षर का बेहद वजनी शब्द। एक अकथित जिम्मेदारी। हमारे जीवन की अभिन्न एवं अनमोल धुरी। प्रत्येक परिस्थिति में इनकी ढाल बन हम इन्हें प्रसन्न एवं सम्पन्न देखना चाहते हैं। हमारे दिन-रात मात्र इनके दुःख-सुख की चिंता में व्यतीत होते हैं। उनके भविष्य के लिए विचलित एवं चिंतित, उनके वर्तमान के लिए भयभीत, उनके लिए विभिन्न योजनाएँ बनाते-बनाते हम अपने सुख एवं आनंद से बेपरवाह हो गए हैं। हालांकि उन्हें एक अच्छा एवं समृद्ध जीवन देने की हमारी अति-अभिलाषा ने हमें कहीं यथार्थता से दूर भी किया है परन्तु माता-पिता ऐसे ही होते हैं। अपने अरमानों एवं स्वपनों की आहुति से बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को प्रदीप्त करते ‘माता-पिता’। परन्तु यदा-कदा त्यागों की श्रृंखला लम्बी करते-करते हम बच्चों की हमसे वास्तविक अपेक्षाओं की अवहेलना कर जाते हैं। बलिदानों की कृतज्ञता से बच्चों को दबाकर उनके सम्मुख हम अपनी महानता एवं श्रेष्ठता प्रस्तुत करना चाहते हैं। परन्तु क्या वास्तव में हमारे बच्चे हमारी उस महानता के लोभी हैं? या वे हमसे कुछ और ही आस लगाए हैं? इस फ़िल्म की बात करें तो ‘कायरा’ जिसके इर्द-गिर्द यह सारी पटकथा घूम रही है, वह अपने माता-पिता से वास्तव में क्या चाहती है, यह वे समझ ही नहीं सके। उसके माता-पिता उसकी भलाई समझते हुए उसे उसके नाना-नानी के पास छोड़ अपना बिजनेस सेट करने चले जाते हैं। किंतु एक बच्चे के मृदुल मन पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है, इससे वे अनभिज्ञ थे। मुझे अपनी मित्र की एक बात अक्सर याद आती है और अपने बच्चे के प्रति संवेदनशील रहने के लिए कभी उस बात को विस्मृत नहीं किया जा सकता। मैं नहीं चाहती कि कभी अज्ञानतावश भी मैं वह भूल कर जाऊँ, जिसका दुष्प्रभाव उसके मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़े हुए है। मेरी मित्र की मम्मी उसे दो माह की आयु में छोड़कर विदेश घूमने चली गई थी। आज भी वह पैतींस वर्षीय मित्र अपनी माँ से इस बात के लिए रूष्ट है। एक प्रश्न उसे बार-बार कौंधता हैै- ‘‘क्या घूमना मुझसे भी अधिक आवश्यक था माँ?’’ गौरतलब यह भी है कि दो माह की बच्ची के साथ घटित इस घटना को किसने और किस प्रकार उसके सम्मुख प्रस्तुत किया? ऐसा क्या बताया या सिखाया गया कि उसके मासूम मन पर इतनी गहरी चोट लगी। संभवतः उसकी माँ घूमने न जाकर किसी विशेष कार्य के लिए गई हो। कुछ भी हो सकता है परन्तु बाल-मन पर उन बातों का क्या प्रभाव पड़ा, यह विचारणीय है। मेरे संज्ञान में ऐसी कई महिलाएँ हैं जो मुरादाबाद से मेरठ प्रतिदिन यात्रा कर नौकरी कर रही हैं। उनके गन्तव्य तक का आने-जाने का सफ़र लगभग 300 किमी. प्रतिदिन है। प्रातः तीन बजे उठना। कभी ट्रेन तो कभी बस। सुबह-सुबह की परेड। मार्ग में प्रतिदिन एक नया अनुभव। विभिन्न प्रकार के लोग। कई स्वस्थ व्यक्ति के रूप में मनोरोगी। प्रतिदिन जीवन का खतरा। सुबह निकले तो हैं पर रात को घर लौटंेगे या नहीं। कभी रात को सात बजे घर आना, तो कभी नौ बजे। तीन बजे से भागते-भागते रात को बारह बजे तक भागना। उनमें से कई महिलाओं के पति भी किसी अन्य शहर से आते-जाते इसी प्रकार का जीवन व्यतीय कर रहे हैं। दिनभर अपनी-अपनी नौकरी कर ये पंक्षी रात को अपने रैन-बसेरे में वापस लौट आते हैं। वे दोनों मात्र एक प्रश्न के भय से भाग रहे हैं- ‘‘आप दोनों मुझे नाना-नानी के घर छोड़कर पैसा कमाने चले गये थे। आपको आपके करियर से प्यार था, मुझसे नहीं। मुझे आप दोनों चाहिए थे पैसा नहीं।’’ इन वाक्यों के भय ने उन सबकी ज़िंदगी का रूख मोड़ दिया है। बहुत सरल-सा प्रतीत होता है यह ‘अप-डाउन’ शब्द। परन्तु इसके पीछे के कष्ट कई बार असहनीय हो जाते हैं। रात की नींद से रू-ब-रू मात्र छुट्टियों में ही हो पाते हैं। जब सारी दुनिया भयंकर सर्दियों में रात के तीन बजे की गहरी नींद में मूर्छित-सी होती है उस समय इनकी रसोइयों में खाना पक रहा होता है। नींद की तो मानो इनसे शत्रुता गई हो। थकान ने स्थाई तौर पर इनकी देह में प्रवेश कर लिया हो। अब तो अहसास होना भी बंद हो गया है। रात को अपने बच्चे के चंद घंटों के साथ के लोभ में ये प्रतिदिन भागते रहते हैं। अगले दिन की भागदौड़ के लिए जब ये बच्चे को रात को नानी-दादी के घर छोड़कर जाते हैं तो बच्चे के द्वारा प्रतिदिन कहे जाने वाले शब्द ‘मम्मी जाना नहीं’ आज यह फ़िल्म देखकर डरा रहे हैं। कहीं कल हमारे बच्चे हमसे यह शिकायत तो नहीं करेगें कि आप तो मुझे छोड़कर चले जाते थे! शायद इसीलिए रात के एक बजे विचारों की भँवर में डूबे नींद का दामन छोड़ कलम को उँगलियों में सुशोभित कर दिया है। क्या समझा पाएँगे ये माता-पिता अपने बच्चों को अपनी मजबूरी, अपनी जटिलताएँ। क्या समझ पाएगा वह कभी कि क्यों उसके माता-पिता उसे छोड़कर जाने के लिए बाध्य हैं? न जाने कितने माता-पिता अपने बच्चों व परिवार के लिए प्रतिदिन के खतरों व कष्टों को झेलते हुए नौकरी कर रहे हैं। कितनी ही माएँ अपने दूधमुहे बच्चे के साथ सामान के बोझ से लदी अकेली ही ट्रेनों व बसों का सफ़र करती हैं। अपने परिवारों से हजारों किमी दूर, अनजानी जगह-अनजाने शहर में परेशान-बेबस। केवल माँ ही नहीं वरन् लाखों पिता भी अपने बच्चों से दूर उनके सुखी भविष्य के लिए नौकरी की मजबूरी में अलग-अलग शहरों से सफ़र करते हैं। एक समाचार-पत्र के अनुसार लगभग डेढ लाख लोग मेरठ से दिल्ली प्रतिदिन सफ़र करते हैं। यह आँकड़ा मात्र मेरठ से दिल्ली के बीच के मुसाफ़िरों का है। और भी न जाने कितने शहरों एवं गाँवों की इसी प्रकार की स्थिति है। यह सही है कि सबको मनपसंद स्थान पर काम मिलना या सरकार की तरफ से दिया जाना सरल नहीं। परंतु जहाँ सरल किए जाने की संभावना एवं साधन हैं, वहाँ तो प्रयास किए जाने चाहिए। यात्रा के सुगम एवं सुरक्षित परिवहन साधनों की व्यवस्था, महिलाओं के लिए ट्रांसफर के सरल नियम, नौकरी के स्थान की परिसीमा में रहने की बाध्यता समाप्त करना इत्यादि। सामाजिक प्रतिष्ठा से लेकर पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन तक ‘नौकरी’ शब्द अपनी अहम भूमिका निभाता है। यह मजबूरी भी है और आवश्यकता भी। परन्तु इन सबके साथ-साथ एक अन्य शब्द की भी अवहेलना नहीं की जा सकती। वह है परिवार। मुख्यतः बच्चे। देश, परिवारों से बनता है और यदि परिवार ही बिखर जाएंगे तो देश के अस्तित्व की कल्पना ही बेमानी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने देश को एक शिक्षित एवं संस्कारी परिवार दे दे तो देश से भ्रष्टाचार, बेइमानी, अपराध जैसे व्याधियाँ स्वतः कम हो जाएंगी। ‘‘कोई व्यक्ति देश के लिए कितने घंटे कार्य करता है, से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है वह देश के लिए किस प्रकार के कार्य करता है’’। यदि व्यक्ति अपने कार्यस्थल पर संतुष्ट नहीं है और अपने परिवार तक वह कुंठा लेकर जाता है तो निश्चित रूप से उसके परिवार में संतोष-सुख जैसे शब्दों को स्थान नहीं मिल सकेगा। और यहीं से परिवार की खूबसूरत तस्वीर बदरंग होनी शुरू हो जाएगी। परिणामस्वरूप जाने-अनजाने व मजबूरी में ऐसे परिवारों में अपराधिक प्रवृत्तियों का जन्म होना प्रारंभ हो जाता है। हम भारत में अमेरिका की कल्पना करते हैं। ब्रेन-डेªन की आलोचना करते हैं। परन्तु इसके पीछे के वास्तविक कारणांे का सामना नहीं करना चाहते। कितनी ही बार यह विषय चर्चा में रहता है कि भारत का टेलंेट बाहर विदेशों में क्यांे जाता है? कारण स्पष्ट है, जिसे हम ‘जॉब सेटिस्फैक्श’ के नाम से भी जानते हैं। बहरहाल बात शुरू की थी ‘डियर ज़िंदगी’ से। निश्चित रूप से बच्चे मासूम होते हैं। वे प्यार के साथ-साथ आपका स्नेही स्पर्श भी चाहते हैं। आपकी व्यस्तताओं को समझने की समझ उनमें नहीं होती। बहुत सरल एवं ज़िंदगी की कटुता से अनभिज्ञ ये मासूम न जाने किस बात पर आपसे नाराज हो जाएं, आप समझ भी न सकेंगे और ये कह भी न सकेंगे। ‘काम-काम-काम’ ये भाषणों तक रहने दे लेकिन वास्तविक जीवन में परिवार को समय दें। विशेष रूप से बच्चों को। उनका बचपन फिर कभी नहीं लौटेगे। उनकी नन्हीं शरारतें जो आज आपको परेशान भी कर जाती है अगर खामोश हुई तो तड़प उठंेगे आप। ख्याल रखिए उनका।

Thursday, November 19, 2015

दशरथ माँझी

प्रेम, सच्चा प्रेम, अथाह प्रेम, ‘दशरथ माँझी का प्रेम’। अगर कोई आम व्यक्ति उथले तौर पर देखे तो दशरथ माँझी को सनकी-ठरकी जैसे शब्दों से संबोधित करेगा। परन्तु यदि कोई वास्तव में
प्रेम की गहराई को समझे तो वह प्रेम की एक ऐसी मिसाल हैं जो वर्तमान पीढ़ी को एक सुंदर एवं हृदयस्पर्शी संदेश देते हैं। उन्हें दिए गए ‘सनकी’ संबोधन को यदि सही शब्दावली दी जाए तो वे ‘जुनूनी’ थे। हवा के रूख के विपरीत स्वतंत्र आकाश में विचरण करने वाले ‘विजेता’। लगनशील, धैर्यशील एवं कभी हार न मानने वाले। समस्त विपरीत परिस्थितियों में, नकारात्मक संवादों के मध्य स्वयं को मात्र अपने प्रेम को समर्पित करने वाले ‘दशरथ माँझी’। वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए प्रेम की जो परिभाषा है वह अत्यधिक संदिग्ध है। वास्तव में वे प्रेम, आकर्षण एवं हवस के मध्य भेद स्पष्ट करने में समर्थ नहीं हैं। उनके लिए प्रेम के मायने मात्र मौज-मस्ती एवं साथ जीवन बिताना है। और भी अनेक भद्दे क्रियाकलाप उनकी दिनचर्या के अंग हैं जिन्हें वे प्रेम का नाम देकर या तो अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं या वे वास्तव में अनभिज्ञ हैं। उन सभी को दशरथ माँझी के जीवन पर बनी यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए और समझना चाहिए कि सच्चा प्रेम किसी को उठा ले जाना, किसी की हत्या करना, किसी पर एसिड फेंकना या किसी के साथ दुराचार करना नहीं वरन् किसी के लिए समर्पित होना है। उसके दुःख-सुख को अपनाना है। उसकी भावनाओं को समझना है। उसकी आँखांे मंे आँसू अवश्य हो मगर खुशी के। परन्तु अत्यन्त खेद के साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान पीढ़ी ने प्रेम की अत्यधिक शर्मनाक परिभाषा गढ़ी है। ‘तू नहीं तो कोई और सही, कोई और नहीं तो कोई और सही’ या ‘तू मेरी नहीं तो किसी की भी नहीं’। दोनों ही स्थितियों मेें प्रेम का एक घृणित रूप प्रकट होता है। ‘लिव-इन’ जैसे संबंधों ने तो रिश्तों को ओच्छा रूप दे दिया। रिश्तों में बंधना एवं एक-दूसरे के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना हमारी युवा पीढ़ी को बंधंन प्रतीत होता है। स्वतंत्रता से स्वच्छंदता के सफ़र में वे आत्मीयता को खो चुके हैं। ‘लव-इश्क-मोहब्बत’ का राग अलापने वाले या तो पारिवारिक जिम्मेदारियों में बंधना नहीं चाहते और यदि बंध गए तो उनका गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार पल-पल प्रेम व रिश्तों को अपमानित करता है। दुःखद यह है कि आगामी समय में इसका और विभत्स रूप ही देखने की उम्मीद है। व्यक्तिगत् स्तर पर मैं यह महसूस करती हूँ कि ताजमहल की भाँति दशरथ माँझी द्वारा बनाए गए उस मार्ग को ‘राष्ट्रीय संपदा’ घोषित किया जाना चाहिए। हमारी लगभग समस्त ‘राट्रीय संपदाएँ’ भले ही हमारे सम्मानीय पूर्वजों प्रदत्त अनमोल उपहार हों परन्तु दशरथ माँझी की स्वनिर्मित यह रचना एवं कठोर तपस्या उनके सम्मुख अतुलनीय है। ताजमहल ‘प्रेम की निशानी’ अवश्य है परन्तु दशरथ माँझी के मार्ग एवं ताजमहल के मध्य तुलना की जाए तो ताजमहल ‘दीवानेपन’ का परिणाम है और ‘दशरथ माँझी मार्ग’ समर्पण का प्रमाण है। निश्चित रूप से अकेले विकट परिस्थितियों में पहाड़ तोड़ना, अपने दीवानेपन को अपने दासों की सुंदर कल्पना के माध्यम से प्रकट करने से कहीं ज़्यादा जटिल एवं महान है। दशरथ माँझी के उस प्रेम के तुल्य अभी तक कोई मिसाल मेरी जानकारी में नहीं है। वास्तव में इसकी तुलना करके इस पवित्र प्रेम को अपमानित भी नहीं किया जाना चाहिए। जहाँ एक ओर ‘दशरथ माँझी मार्ग’ अपार प्रेम को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर यह दशरथ माँझी की जनहित भावनाओं को भी प्रदर्शित करता है। वे इस मार्ग का निर्माण इसलिए भी करना चाहते थे जिससे जो दुःखद घटना उनके जीवन का अंग बनी, उसकी पुनरावृत्ति किसी और जीवन में न हो। वे उस अपार कष्ट से इतने व्यत्थित थे इसकी कल्पना तक भी वे किसी अन्य के प्रति न कर सके। परहित के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। दूसरों के कष्टों को अपने जीवन का अंग बनाने वाले- ऐसे थे दशरथ माँझी। केतन मेहता द्वारा निर्देशित यह फिल्म न केवल निर्देशन की दृष्टि से वरन् पात्रों के अभिनय की दृष्टि से भी अत्यधिक भावुक एवं बेहतरीन फिल्म है। निर्देशक ने छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से पिता का बच्चों के प्रति प्रेम, सरकारी तंत्रों की निकृष्टता, गरीबी, राजनेताओं का भद्दा प्रदर्शन, तानाशाही, जमींदारों की क्रूरता को अत्यंत संवेदनशील ढंग से प्रदर्शित किया है। हम आभारी हैं केतन मेहता के जिन्होंने दशरथ माँझी जैसे महान व्यक्तित्व एवं उनके कठोर जीवन से हमारा परिचय कराया।

Sunday, May 10, 2015

Book Review- Half Girlfriend

Writer – Chetan Bhagat Half Girlfriend by Chetan Bhagat, again created the same history: The best selling book. As usual I also had the same excitement about the book. But after reading the book I really got disappointed. At this stage of the career people expect more from Chetan but he presented the same stuff again, seems like packaging is new but the product is old. I really don’t want to be harsh but this book bounded me to say this in the straight voice that if you don't want to waste your time please don't go through that. The same kind of dramatic and boring romantic stuff, of no use. Book will start with little filmy drama. Up to the middle also it is bearable, one climax when hero’s girlfriend goes, will definitely create your interest but after reading 2-3 pages of the scene you will return to the old kind of filmy mother's scene with the girlfriend. This will definitely get you bore. End of the book will sucks you. Over dragging struggle of the hero for finding his girlfriend and met in the last night when he was about to leave the place and dropped the idea also, running on the roads, no taxi, heavy snowfall etc., seems like Chetan taking the exam of your patience. Well my suggestion is: to save your time, better to go for any other good one.

Sunday, January 18, 2015

पीके

शहीद भगत सिंह ने कहा था ‘‘आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिए लोग आपको अहंकारी कहेंगे।’’ सच ही कहा है, प्रायः लोग अपनी ‘लकीर के फकीर’ मानसिकता की परिधि से बाहर आते घबराते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि बाहर आने के पश्चात् उन्हें अन्य कोई आसरा नज़र नहीं आता या कोई अन्य मान्यता नहीं मिलती। वे स्वयं को असहाय-असहज महसूस करते हैं। और कदाचित् होते भी हैं। कारण- अज्ञानता, निर्भरता एवं भय। अज्ञानता के कारण वे निर्भर है और निर्भरता के कारण भयभीत। वे प्रायः अगुवाई करने से घबराते हैं और अगर कोई पथप्रदर्शक मिल जाए तो बीच राह में उसके अदृश्य हो, धोखा देने, जो कि मानवीय प्रवृति है, उन्हंे भयभीत कर देती है। वे ग़लत भी नहीं हैं। अक्सर ऐसी राहें जटिल तो होती ही हैं और उन पर दृढ़ रहना उससे भी अधिक कठिन होता है। बहरहाल यहाँ बात है आमिर खान की फिल्म पीके के बहिष्कार की। यह विरोध वास्तव में किसी लतीफे से कम नहीं है। बिलकुल ऐसा, मानो एक दृृृष्टिबाधित कह रहा हो कि सूरज लाल नहीं काला है। वास्तव में उसके लिए सूरज काला ही है और यह कहना उसकी विवशता। परन्तु जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं वे तो विवश नहीं हैं! फिर ये कैसी मानसिकता है? वस्तुतः जिन मुद्दों का विरोध किया जा रहा है वे तो फिल्म का हिस्सा भी नहीं है। विरोध है कि फिल्म हिन्दु विरोधी है और हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान करती है। जबकि फिल्म में प्रत्येक धर्म के ‘‘ठेकेदारों’’ का विरोध किया गया है, न कि किसी धर्म विशेष का। यह फिल्म अंधविश्वास और धर्म का धंधा करने वाले दलालों को केन्द्रित करके बनाई गई है फिर वे चाहे किसी भी धर्म के हों। सच तो यह है कि हम सभी इन ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं। इन्हें अपनी दुकान के रहस्य खुलते प्रतीत हुए तो नचा दिया जन-समूह को विरोध करने के लिए। ये पारंगत हैं मानसिक पराधीनता का दुरुपयोग करने में। क्या ऐसा नहीं है? इस बात का दावा किया जा सकता है कि जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं उनमें से अधिकतर ने तो यह फिल्म देखी भी नहीं होगी। तो भला क्यों कर रहे हैं विरोध? क्योंकि यह फिल्म एक मुस्लिम व्यक्ति ने बनाई है! यह तो कोई मुख्य वजह नहीं हो सकती! बॉलीवुड में हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया जाता है, टॉलीवुड में तमिल एवं इसी प्रकार अन्य। कहीं भी मुस्लिमवुड का अस्तित्व नहीं है और न ही इस प्रकार धर्मविशेष का अस्तित्व होना चाहिए। तो भला इस फिल्म को धर्म विशेष के लिए कैसे बना सकते थे? किसी भी विषय का सामान्यीकरण करके ही प्रस्तुत किया जाना विषय के साथ न्याय करना है। एक ओर तो हम धर्म-निरपेक्षता की बात करते हैं। ‘‘हम सब भारतीय हैं’’, के नारे लगाते हैं। दूसरी ओर किसी भी अनावश्यक विषय को धर्म-जाति से जोड़ देते हैं। किसी भी निर्माण के पीछे छुपी धारणा के स्थान पर निर्माता के धर्म को अधिक महत्त्व कैसे दिया जा सकता है? निर्माता द्वारा परोसी गई अश्लीलता दर्शकों एवं फिल्म की माँग के नाम पर सरलता से स्वीकार कर ली जाती है परन्तु वास्तविक एवं उपयोगी तथ्यों का विरोध मात्र इस आधार पर किया जाता है कि वे किसी धर्म से जुड़े हैं। निश्चित रूप से यह भावी पीढ़ी को भ्रमित करने का घृणित प्रयास है तथा सामाजिक दृष्टि से घातक भी है। इस फिल्म का एक बहुत सुंदर दृृश्य हमारी संकुचित मानसिकता एवं कुतर्कों पर कटाक्ष करता है। पीके पर आरोप था कि वह ईश्वर को नहीं मानता। उससे पूछा गया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते? उसने कहा मानता हूँ। बिलकुल मानता हूँ। मगर उस ईश्वर को मानता हँू जिसने हम सबको बनाया न कि जिसे आपने बनाया। सही ही तो कहा पीके ने। मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च इत्यादि में हमने अपने-अपने स्वार्थानुसार ईश्वर बनाए और अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार उन्हें पूजते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग तो ईश्वर को इसलिए पूजते हैं क्योंकि उनके पूर्वज उनकी पूजा करते आ रहे हैं। यदि उनसे पूछा जाए कि उनके ईश्वर का इतिहास क्या है या उनके माता-पिता कौन थे तो वे इससे अनभिज्ञ है, पूर्णतः निरुत्तर हैं। आज की युवा पीढ़ी तो इतनी आधुनिक हो गई है कि उन्हें होली-दिवाली जैसे मुख्य त्योहारों को मनाने के कारणांे तक का ज्ञान नहीं है। हाँ! लेकिन वे मंदिर अवश्य जाते हैं क्योंकि उनके भगवान जो वहाँ हैं। हम सभी जानते हैं कि मंदिरों में बैठकर किस प्रकार की चर्चाएँ की जाती हैं और प्रत्येक व्यक्ति इस बात की आलोचना भी बहुत ऊँची आवाज़ में करता है परन्तु वे सभी अवसर पाते ही स्वयं भी यही सब करते हैं। सही कहा जाता है कि भाषण दूसरों को देने के लिए ही होते हैं। ख़ैर बात यह है कि क्या यह सच्ची श्रद्धा है? या मात्र दिखावा या आत्मसंतुष्टि? यहाँ पुन शहीद भगत सिंह की बात प्रासांगिक लगती है कि प्रचलन का विरोध सरलता से स्वीकार्य नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ अपनी निरंकुशता के कारण ही समाप्त होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। सती प्रथा हो या विधवा विवाह प्रत्येक प्रथा के प्रति होने वाले विरोध के भी विरोध में लोग मान्यताओें और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का राग अलापते आए हैं परन्तु अन्ततः उन्हें समाप्त होना ही पड़ा। आज समाज के बुद्धिजीवी इन विषयों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा का विषय बना रहे हैं। उनका आम आदमी को इन भ्रमजालों से मुक्त करने का प्रयास सरहानीय है। वास्तव में आम आदमी स्वयं भी कहीं न कहीं इन समस्त पाखंडों से उकता गया है। वह स्वयं भी इन निरर्थक बंधनों से मुक्त होना चाहता है परन्तु साहस नहीं कर पाता। 1947 में भारत स्वतंत्र भले ही हो गया हो परन्तु मानसिक स्वतंत्रता से अभी भी वह कोसों दूर है। इस पराधीनता के अधीन रहकर उन्नति संभव नहीं और यह भौतिक परतंत्रता से कहीं अधिक घातक भी है। एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्वपटल स्वयं को स्थापित करने के लिए भारत को एक स्वतंत्र चिंतक होना अति आवश्यक है।

Monday, February 25, 2013

बहुआयामी परिवर्तन की दरकार

दिल्ली गैंगरेप की घटना ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को जहाँ एक ओर जगहँसाई का पात्र बनाया, वहीं दूसरी ओर यहाँ की लोकतंत्रात्मकता पर शर्मसार कर देने वाला प्रश्न चिह्न भी आरोपित किये। एक ऐसा देश जहाँ भूमि को माँ का दर्जा दे इसकी पूजा की जाती है, भारत माँ के नारों की प्रेरणा रोंगटे खड़े कर देने वाला जोश भर देश की आज़ादी का नेतृत्व करती हो, संस्कृति स्त्री को देवी के रूप में पूजने की रही हो, इतिहास स्त्री सम्मान हेतु रणभूमि में नगाड़े बजाता हो, एक ऐसा देश जिसे विश्व में इसकी सभ्यता के लिए शीर्ष पर रखा जाता हो, ऐसे भारत देश ने विश्वभर में उपर्युक्त समस्त उपमाओं की सत्यता को संदिग्ध ही नहीं किया वरन् अपनी दोगली मानसिकता को प्रमाणित कर दिया। मानसिकता जो कहीं लिखित रूप में तो स्वीकार्य नहीं है, परन्तु सर्वव्यापी है। इस घटना ने भारतीय लोकतंत्र के समस्त महत्त्वपूर्ण स्तम्भों की सार्थकता एवं कर्तव्यनिष्ठा को कटघरे में खड़ा कर दिया। वे महत्त्वपूर्ण स्तम्भ जो किसी भी समाज की सुचारू व्यवस्था के लिए उत्तरदायी हैं। परिवार, समाज, धर्म, राजनीति, पुलिस, मीडिया एवं तकनीकी वर्तमान में ये किसी भी समाज के अभिन्न अंग हैं। इनमें से किसी भी एक के दिशाहीन होते ही सामाजिक ढाँचा बिगड़ने लगता है। व्यवस्था चरमराने लगती है और अवांछनीय परिणाम पतन के संकेत देने लगते हैं। अतएव एक उत्तम एवं आदर्श समाज की रचना के लिए इन महत्त्वपूर्ण स्तम्भों की विवेचना करनी अति आवश्यक है। समाज की सबसे छोटी एवं महत्त्वपूर्ण इकाई परिवार है। छोटे-छोटे परिवार संयुक्त हो एक बड़े समाज की रचना करते हैं। अगर इसे किसी पौधे की जड़ की संज्ञा दी जाए तो गलत न होगा। यदि किसी पौधे की जड़ों में कोई दोष उत्पन्न हो जाए तो निश्चित रूप से पौधे का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वर्तमान में हमारे पौधे रूपी समाज में की जड़ों में ऐसे अनेक दोष उत्पन्न हो गये हैं। वैचारिक अतिक्रमण ने परिवारों को विछिन्न कर एकलवाद एवं स्वार्थ से निहित कर दिया है। दिल्ली गैंगरेप की वीभत्स घटना को ध्यान में रखते हुए पारिवारिक दोषों में से एक का चयन किया जाए तो वह है स्त्री के प्रति परिवारों की दूषित एवं तुच्छ मानसिकता। यह वह पुष्प है जिसके कली बनने से पूर्व ही अस्तित्व-संघर्ष की जंग आरंभ हो जाती है। वजूद पाने से पूर्व जानवरों के मुख में फँसे भू्रण प्रश्न करते हैं कि यह समाज हमारी हत्या कर, उपभोग के लिए ही सही परन्तु इस रचना को पुनः कैसे प्राप्त करेगा? जी हाँ, कटु परन्तु सत्य कि ‘स्त्री’ शब्द सामाजिक दृष्टि से चिरकाल से ही ‘उपभोग’ का पर्यायवाची रहा है। प्रत्येक युग व काल स्त्री का उपयोग या कहें स्वार्थपूर्ति हेतु प्रयोग ही करता आया है। इस शब्द का स्वतंत्र अस्तित्व मोटी-मोटी पोथियों में भले ही स्वीकार लिया गया हो परन्तु यर्थाथता स्त्री के प्रति होने वाले अपराध एवं प्रताड़नाओं के समक्ष इस किताबी ज्ञान को सिरे से नकारती है। घर-परिवारों में होते अत्याचार चाहे वे भू्रण हत्या के रूप में हों, घरेलू हिंसा, दहेज, छेड़छाड़, बलात्कार, शोषण, संपत्ति संबंधी झगड़े या छोटे-छोटे भाई-बहन के झगड़ों के रूप में इन सभी में भुक्तभोगी एवं सहता स्त्री ही होती है। उसे विभिन्न कथनों द्वारा कभी सांत्वना दी जाती है तो कभी डराया-धमकाया जाता है परन्तु सहन करने के नैतिक जिम्मेदारी अंततः उसी की ही होती है। कुछ जुमले स्त्री को बचपन से ही याद कराए जाते हैं। जैसे कि तुम लड़की हो। घरेलू कार्य तुम्हारे लिए है और घर के बाहर के कार्य तुम्हारे भाई के लिए। वह भाई है इसलिए अमुक वस्तु पर उसका प्रथम अधिकार है। तुम लड़की हो अतः अमुक कार्य तुम्हारे लिए नहीं है या उसके क्रियान्वयन के लिए तुम निर्बल अथवा अयोग्य हो। हाय! औरत की किस्मत में तो होता ही यह सब है। तुम इस आज़ादी की हकदार नहीं हो क्योंकि तुम लड़की हो। तुम्हारी सीमा यह है इस दायरे के बाहर जाने का प्रयास तुम्हारे जीवन को संकट में डाल सकता है। वगैराह-वगैराह। परिणाम एक आत्मविश्वासविहीन अबला नारी जिस पर फिर एक जिम्मेदारी है महिला सशक्तिकरण के दावों को प्रासंगिक करने की। स्त्री को कमतर आँकने एवं उसे निर्बलता का अहसास कराने का प्रथम आरोप परिवार पर ही लगता है। समान अधिकारों की चर्चा मात्र सम्पत्ति में अधिकार की बपौती बनकर रह गई है। लड़का-लड़की की परवरिश को क्यों अलग-अलग रूपों में निरूपित किया जाता है? ज़रा सोचिए, अगर दोनों की परवरिश समान रूप से की जाए तो दोनों रचनाओं में विभेदीकरण के भाव उत्पन्न ही नहीं हो पाएगें। समानता के धरातल पर की गई परवरिश एक-दूसरे के प्रति आपराधिक भावनाओं से लिप्त विचारों को नष्ट कर देगी। पुरूष होने का गुमान एक बहुत अहम कारण है स्त्री के प्रति होने वाले किसी भी अपराध का। यदि इस गुमान को तठस्थ कर दिया जाए तो पौरुष सिद्ध करने का दबाव पुरूषों पर से समाप्त हो जाएगा। परिणामतः एक सम्मान भाव महिलाओं के प्रति समाज को प्राप्त होगा। इसके विपरीत यदि यही आत्मविश्वास महिलाओं में जागृत किया जाए कि वे किसी भी रूप में पुरूष प्रजाति से कम नहीं तो वह वास्तव में मानसिक रूप से सबल हो सकेगी। सर्वविदित है कि बल प्रत्यक्ष रूप मानसिक दृढता का प्रतीक है। यदि पुरूष जाति को जन्म से यह अहसास कराया जाए कि वह निर्बल है, कमजोर है, पराधीन है तो निश्चित रूप से वह भी वही जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाएगा जो 99 प्रतिशत आधी आबादी आज जी रही है। यह विषय आज़ादी एवं अधिकारों से कहीं अधिक मानसिक परिवर्तन का है। महिला सशक्तिकरण शब्दावली के प्रयोग ने ही महिलाओं में परिवर्तन की ब्यार का प्रदर्शन किया है। यदि जन्म से ही इस शब्द से वास्तव में उन्हें जोड़ा जाए तो क्या कोई महिला अबला रहेगी? यह दायित्व परिवार एवं शिक्षा का है। महिलाओं को तुच्छ होने के बोध से स्वतंत्र कराते हुए उनका साथ दिया जाए। बजाए उन्हें परजीवी बनाने के, उन्हंे आत्मनिर्भर की परिभाषा समझाई जाए। बजाए सामाजिक व्याधियों, निष्ठुरता, कठोरता एवं विभिन्न नकारात्मक शब्दावली से डराने के उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप दृढ़ किया जाए। बजाए उन्हें घर में बंद करने के उस प्रदूषित मानसिकता से लड़ने की शक्ति प्रदान की जाए जो उनके आत्मबल पर प्रहार करती है। किसी महिला के विरूध हुए अपराध के पश्चात् सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका उसके परिवार की होती है। ऐसी स्थिति में परिवार के संयंमित एवं संतुलित संवाद उस महिला के भविष्य को सुनिश्चित करते हैं। यह वह क्षण है जो उसे तिमिर में रोशनी की किरण भी दिखा सकता है और गुमनाम, लक्ष्यहीन अंधकारमय जीवन भी दे सकता है। उसे भविष्य में आगे बढने की प्रेरणा भी दे सकता है और निराशावादी एवं अवसादग्रस्त जीवन भी। परिवार यदि संतुलित मानसिकता का धनी हो तो निश्चित रूप से वह उसे अपराजिता बना सकता है। अमूमन परिवार किसी अवांछनीय-अप्रिय घटना के पश्चात् महिला की पहचान छिपाकर, लिपटे चहरे को आत्मग्लानि से भरने के प्रबल समर्थक होते हैं। यदि परिवार पूर्ण आत्मविश्वास एवं दृढ़ता से उस महिला का सम्मान समाज के समक्ष करे और उसके निर्दोष व्यक्तित्व को स्वीकार करे तो कभी कोई समाज ऐसी किसी भी भुक्तभोगी का उपहास करने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा। हम जिस रूप में स्वयं को स्वीकारते हैं समाज बाध्य होता है हमें उसी रूप में स्वीकार करने के लिए। बस आवश्यकता होती है हमारे दृढ़ निर्णय एवं आत्मविश्वास की। कहा भी गया है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। लिहाजा निर्दाेष को घृणित दृष्टि से लज्जित करने का तो कोई औचित्य ही नहीं है। यह हमारी सामाजिक विडम्बना है कि वह किसी की बेचारगी/बेबसी को चर्चा का विषय अपने रसास्वादन के लिए बनाता ही है। तो क्यों परिवार ऐसे अवसर व अनुमति प्रदान करे जिससे व्यक्ति विशेष सरकस के जोकर की भाँति मनोरंजन का साधन बन जाए? अब अगर बात की जाए समाज की तो परिवार की ही भाँति समाज भी किसी भी अपराध की जड़ को सींचने के लिए समान रूप से उत्तरदायी है। देखा जाए तो समाज परिवार का ही अप्रत्यक्ष रूप है। जो भूमिका एवं दायित्व परिवार के हैं, वही समस्त समाज के भी हैं। परन्तु इससे भिन्न समाज एक स्वतंत्र संस्था के रूप में भी है। समाज आंतरिक संरचना छोटे-छोटे अनेक समाजों में विभक्त हैं, जो अपनी-अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके अपने सामाजिक नियम, कायदे-कानून, व्याख्याएँ हैं जो संबंधित इकाई पर लागू होते हैं। समाज और परिवार एक-दूसरे के पूरक हैं। कभी एक-एक परिवार मिलकर समाज के स्वरूप को परिवर्तित कर देता है तो कभी समाज किसी परिवार के वजूद-स्थायित्व का धोतक होता है। पुरूष प्रधान सरीखी संकीर्ण मानसिकता आज भी हमारे समाज को नियंत्रित कर रही है। पुरूष अपनी सत्ता कायम रखने के लिए प्रत्येक प्रकार के हथकंडे अपनाने के लिए तत्पर है। दिल्ली गैंगरेप कांड पुरूष सत्तात्मक विचारधारा का ही परिणाम है। इस कांड ने तथाकथित समाज के बहुत से वर्गों व इकाईयों की पोल खोल दी। महिलाओं के विरूध होती ब्यानबाजी ने यह तो सिद्ध कर दिया है कि समाज, जिसमें राजनेता से लेकर हर छोटी-बड़ी संस्था को भी यदि सम्मिलित किया जाए तो स्त्री सम्मान एवं अधिकारों का मात्र दिखावा किया जाता है। वस्तुतः यह सब एक छलावा है। पिछले कुछ वर्षों से ज्वलंत रहने वाली खाप के अनेक फतवे लड़कियों के लिए आते रहे हैं और आते रहेंगे। उन्हें क्या पहनना है, क्या करना है, कहाँ जाना है, किससे विवाह करना है, इत्यादि। परन्तु इतनी जघन्य कांड पर एक भी फतवा किसी पुरूष के लिए कोई सीमा रेखा न खींच सका। एक भी संवाद दिल्ली गैंगरेप पीड़िता के प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिए प्रस्फूटित न हुआ। खाप पंचायतों के किसी भी नेता ने एक बार भी किसी लड़के को उसकी मर्यादा याद नहीं दिलाई। एक भी नेता ने ऐसे अपराध में दोषी को वे क्या सजा देंगे, इसकी विवेचना नहीं की। इज्जत के लिए ऑनर किलिंग के निर्देश देने वाली खाप आज क्यों अपनी बेटी-बहुओं की इज्जत के लिए एक शब्द मुख से नहीं निकाल रही है? अपने कानून स्वयं निर्मित करने वाली खाप की कानूनी किताब में ऐसे अपराधों के लिए न्याय की क्या व्यवस्था है? अगर खाप महिलाओं के दायरे तय करती है तो उसे पुरूषों के दायरे तय करने में इतना संकोच क्यांे? शायद इसीलिए क्योंकि किसी भी खाप पंचायत की सदस्या के रूप में एक भी महिला नहीं है। पुरूषवादी खाप भला अपनी सीमाएँ कैसी बाँध सकती है? लड़कियों के छोटे कपड़े इन्हंे अपराध करने के लिए उकसाते हैं, परन्तु समझ से परे है कि ढाई महीने की बच्ची से 75 वर्ष की वृद्धा इन्हें कैसे आकर्षित करती है? यह सवाल सदैव अनुत्तरित रहा है। क्यों बलात्कार की सजा के रूप में 25 हजार का मुआवजा इन्हें लज्जित नहीं करता? क्यों मर जाती हैं इनकी संवेदनाएँ स्त्री के प्रति? क्यों अस्वीकार्य हैं ऐसे समाज को स्त्री का अस्तित्व? क्यों लड़की के जन्म पर इनके सम्बोधन ‘नकुशा’ (अभागिन/अनचाही/अपशगुनी) हैं? एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार-पत्र में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार ‘‘आल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जिलाध्यक्ष और हापुड़ रोड़ स्थित मदरसा जामिया मदनिया के मोहतमिम कारी शफीकुर्रहमान ने कहा कि अविवाहित दुराचार करे तो उसे सौ कोड़े मारने की सजा है और शादीशुदा करे तो उसे संगसार करने का हुक्म है। दुराचार औरत की रजामंदी के बगैर नहीं हो सकता। कम कपड़े पहनने से पुरूषों के जज्बात भड़कते हैं।’’ एक अन्य समाचार-पत्र के अनुसार एक मुस्लिम देश में महिलाओं को ऐसे बुरके न पहनने का फतवा जारी किया गया है जिसमें से उनके आँखें दिखाई दें, क्योंकि महिलाएँ आँखों के माध्यम से पुरूषों को आकर्षित करती हैं? स्तब्ध कर देने वाली ऐसी असंवेदनशीलता पितृसत्तात्मकता की पैरवी करती है! एक औरत के सम्मान की सजा सौ कोड़े! उसकी रजामंदी न तब पूछी गई जब उसकी आत्मा की हत्या की जा रही थी और न तब पूछी गई जब उस पर निकृष्ट मिथक मरहम लगाया जा रहा था। मानो कि वह को निर्जीव वस्तु हो जिसे किसी अवांछित स्पर्श का कोई फर्क ही न पड़ता हो। औरत को दया, प्रेम, ममता, संवेदनाओं और भावनाओं की प्रतिमूर्ति माना जाता है और उससे इन्हीं से युक्त व्यवहार की अपेक्षा की जाती है परन्तु जब उसे इन्हीं कोमलताओं की आवश्यकता होती है तो कैसे सारी संवेदनाएँ अपंग हो जाती हैं? ऐसे अनेक ‘क्यों’ है जो स्त्री संदर्भ में गूँगे हो जाते हैं। मेरे ‘क्यों’ पुरूषप्रधान जड़ता से ये हैं कि ‘‘क्यों महिलाओं के छोटे कपड़े देखकर उनके जज्बात भड़कते हैं? क्यों वे पर-औरत का सम्मान उसी प्रकार नहीं कर पाते जैसे वे अपने घर की महिलाओं का करते हैं? क्यों महिलाओं के उकसाने पर वे आत्मनियंत्रित नहीं हो पाते? क्यों वे गलत संकेत देने वाली महिलाओं को एक थप्पड़ मारकर यह नहीं कह पाते कि वह गलत है? क्यों वे उनके साथ हो लेते हैं? क्यों वे ऐसी महिलाओं के विरूध पुलिस में शिकायत नहीं करते? क्यों उनका मस्तिष्क इतना पवित्र नहीं है कि महिलाओं के किसी भी व्यवहार पर वे तठस्थ रहें? क्यों वे अपनी कमजोरियों का दोषारोपण महिलाओं पर करते हैं? क्यों बलात्कार के लिए वे दोषी नहीं हैं? क्यों उनकी नज़र महिलाओं के उभारों को देखने के लिए ललचाती है? क्यों वे महिलाओं का उपयोग व उपभोग करना अपना एकाधिकार मानते हैं? क्यों वे महिलाओं को अपनी शारीरिक ताकत के बल पर जीतना चाहते हैं? क्यों पुरूष ही महिलाओं का शोषण करता है? क्यों सारी सीमाएँ-प्रतिबधताएँ महिलाओं के लिए ही हैं? क्यों भुक्तभोगी होने पर भी स्त्री ही शर्मिंदा हो और पुरूष शान से जीये? क्यों वे समाज में महिलाओं की समान रूप से भागीदारी के पक्षधर नहीं हैं? क्यों अपनी सफलता महिलाओं की देह से सींचते हैं?’’ इन प्रश्नों के उत्तर स्वरूप अक्सर सृष्टि के रचनाकर्ता पर दोष मढ़ा जाता हैै। परन्तु किसी भी अज्ञात शक्ति पर दोषारोपण कर स्वयं की मानसिक विकलांगता से मुख नहीं मोड़ा जा सकता। ये वे सामाजिक व्याधियाँ हैं जो महिला सशक्तिकरण को चरितार्थ करने में बाधक हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन समस्त ‘क्यों’ का कारण पुरूष प्रधान समाज की हीनभावना व असुरक्षा की भावना हो। महिलाओं को सदैव दुर्बलता का पर्याय मानने वाला समाज कहीं स्त्री के चाँद की ओर अग्रसर होते कदमों से भयभीत तो नहीं है? उनकी उन्नति उसे द्वेष व जलन की भावना से भर कुण्ठित एवं अवसादग्रस्त तो नहीं कर रही? जिसके अधीन वह अपने प्राकृतिक वरदान का दुरूपयोग कर स्वयं को सिद्ध करने का अभ्यास कर रहा है। महिलाओं ने गृह-प्रबंधन में अपना लौहा मनवा गृह-लक्ष्मी का स्थान ग्रहण किया है और घर से बाहर भी प्रत्येक क्षेत्र में स्वयं को पुरूषों से बेहतर सिद्ध किया है। यही प्रतिस्पर्धा महिलाओं के प्रति बढते अपराधों में उत्प्रेरक का कार्य कर रही है। समाज स्वयं भी एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की नियमावली की अवहेलना करने का दोषी है। पक्षपाती दुर्भावनाएँ तो विजेता का चयन पूर्व में ही कर चुकी हैं। दिखावटी नीतियाँ मात्र औपचारिकता का निर्वहन कर रही हैं। चौथे विश्व महिला सम्मेलन में यह बात उभर कर सामने आई कि परिवार और समाज में महिलाओं की प्रतिष्ठा कम होने के कारण ही मुख्यतः उनके खिलाफ हिंसा होती है। महिलाओं के सुरक्षा उपायों के क्रम में कुछ आँकड़े एकत्रित किए गए जिनसे पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा दुनिया के कोने-कोने में व्याप्त है। उदाहरण के लिए दक्षिण अफ्रीका में प्रत्येक 90 सेकेंड में एक महिला पर बलात्कार किया जाता है और प्रत्येक वर्ष लगभग 3,20,2000 महिलाएँ बलात्कार का शिकार होती हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक घंटे 16 महिलाओं की एक बलात्कारी से मुठभेड़ होती है और प्रत्येक छः मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार होती है। फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन यानी संघीय जाँच ब्यूरो ने 1991 में अमेरिका में 106,593 बलात्कार के मामले दर्ज किए थे। जुलाई 1991 में किशोर लड़कों के एक समूह ने पूर्वी अफ्रीका के एक देश में स्कूली छात्रावास में रहने वाली 71 लड़कियों को केवल इस कारण बलात्कार कर दंडित किया क्योंकि उन्होंने स्थानीय विद्यालय प्रशासकों के खिलाफ हड़ताल करने से मना कर दिया था। इस मामले में 19 लड़कियों ने अपना जीवन गवाँ दिया था। इस प्रकार के आँकडे़ देखने से पता चलता है कि पूरी दुनिया में महिलाओं और लड़कियों पर यौनाचार होना एक आम बात है। किसी न किसी धार्मिक या परम्परागत प्रथाओं का सहारा लेकर महिलाओं पर अत्याचार किया जाता है। समाज मात्र एक शब्द नहीं वरन् एक जिम्मेदारी है इसकी परिधि में समाहित प्रत्येक निर्जीव व सजीव के प्रति। दायित्वबोध से पूर्ण समाज की गंभीर भूमिका स्त्रियों को न्यायोचित एवं समान स्थान दिलाने के लिए अति महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए समाज का निष्पक्ष एवं संवेदनशीन होना अति आवश्यक है। आधी आबादी एक नवजात पौधे की भाँति है जो पुरूष सत्ता में धीरे-धीरे उभरने का प्रयास कर रही है। देखना यह है कि अकेले राज करने वाली इस सत्ता में पुरूष समाज किस प्रकार अपनी समझदारी का परिचय देते हुए आधी आबादी का स्वागत करेगा? बहरहाल पंक्ति में तीसरा नम्बर धर्म का है। एनडीटीवी इण्डिया चैनल के पत्रकार रवीश कुमार ने दिल्ली गैंगरेप की घटना से व्यथित हो एक बहुत गहरी एवं सटीक बात कही कि भारत में स्त्रियों की पूजा देवी के रूप में मात्र किताबों या मूर्तियों में होती है, वास्तविक जीवन में तो उसे रिश्तों में ही रौंदा गया है। बिलकुल सही चित्रण प्रस्तुत किया है रवीश जी ने। धर्म के नाम पर हम स्त्री के प्रत्येक रूप का शोषण ही तो करते आए हैं। मुस्लिम धर्म में पुरूष को दो निकाह करने की धार्मिक मान्यता प्रदत है। सरकार भी मुस्लिम स्त्री के अधिकारों को धार्मिक प्रैक्टिस करने के तहत अधिनस्थ करती है। मुस्लिम धर्म में ही नहीं, हिन्दु धर्म में भी भगवान कृष्ण की भाँति अनेक भगवान दो पत्नियों के स्वामी हैं। क्यों यह अधिकार किसी स्त्री/देवी के पास संरक्षित नहीं है? क्यों धर्मों में भी स्त्री-पुरूष के अधिकारों के प्रति पक्षपातपूर्ण व्यवहार की सेंध हैं? यदि धर्म ही दोगला हो तो अनुसरणकर्ता से क्या अपेक्षा की जाए? महाभारत में द्रौपदी को पाँच पांडवों की पत्नी ‘पाँचाली’ के रूप में दर्शाया गया है। शायद भारतीय इतिहास में वह एकमात्र ऐसे महिला थी, जिनके पाँच पति थे। परन्तु यह भी कोई गर्व का विषय भी रहा। वर्तमान में ‘पाँचाली’ शब्द का सम्बोधन नारी को चरित्रहीन की उपमा दे, अपमानित करने के लिए प्रयुक्त होता है। कहना गलत न होगा कि धर्म स्त्री को कमजोर बनाता है। स्तंभों की श्रृंखला में आगे बढे़ं तो अगला क्रम राजनीति का है। प्राचीन काल से ही राजनीति को लभाने वाला विषय ‘स्त्री’ ही रहा है। चौपड़ के पासों से वर्तमान सत्ता के गलियारे तक जब-तब ‘महिलाओं’ पर ही शह और मात का खेल खेला गया। महिला आरक्षण से अधिकारों तक के सफ़र में कितनी सियासतें बदली परन्तु इस विषय ने कभी अपनी प्रासंगिकता नहीं खोई। महिलाओं के अधिकारों पर चुनावी राजनीति करने वाले महिलाओं के मान-सम्मान प्रति कितने संवेदनशील हैं यह या तो चौपड़ के पासों में सिसकती द्रौपदी बता सकती है या वर्तमान राजनीतिज्ञों की औछी मानसिकता (ब्यानबाजी) की शिकार महिलाएँ। एक ऐसा समय जिस पर सारा देश शर्मिंदा है और नैतिक आधार पर कहीं न कहीं स्वयं को दोषी मान रहा है, ऐसे समय में भारत के प्रथम व्यक्ति अर्थात् माननीय राष्ट्रपति के पुत्र का ब्यान कि छात्राओं के नाम पर रैलियों में सुंदर-सुंदर डेंटेड-पेंटेड महिलाएँ पहुँच रही हैं। दिल्ली में जो हो रहा है वो गुलाबी क्रांति है, जिसका जमीनी हकीकत से कोई लेनदेना नहीं है। पहले ये महिलाएँ कैंडल लेकर जुलूस निकालती हैं और फिर शाम को डिस्कोथेक में जाती हैं, निंदनीय है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते ये व्यक्तित्व कितने अमानवीय हैं! औरत की प्रतिष्ठा तार-तार करने वाला यह कोई एकमात्र ब्यान नहीं है कांग्रेस नेता कांतिलाल भूरिया नेता धु्रवनारायण के लिए कहते हैं कि जब तक उनके साथ 4-5 महिलाएँ नहीं होती, उसे नींद नहीं आती है। गौरतलब है कि भूरिया इस कथन में किसका अपमान कर रहे हैं- महिलाओं का या प्रतिद्वंदी का? अपने शब्दजाल की राजनीति में ये क्यों स्त्रियों की गरिमा के साथ खेलते हैं? संविधान के किस भाग में इन्हें यह अधिकार प्राप्त है? क्या आधी आबादी को इन्हें वोट देने की सजा के प्रतिफल स्वरूप यह दुर्भाग्य प्राप्त हुआ है? माकपा नेता अनीसुर रहमान ममता बनर्जी से पूछते हैं कि वे रेप के लिए कितना चार्ज लंेगी? कांग्रेस सांसद संजय निरुपम, स्मृति इरानी से कहते हैं कि चार दिन हुए नहीं और आप राजनीतिक विश्लेषक बनती फिर रही हैं, आप तो टीवी पर ठुमके लगाती थीं। राजनेताओं के कलेवर में ये कैसी तुच्छ असुर मानसिकता विकसित एवं प्रसारित हो रही है! जब मार्गदर्शक ही दिग्भ्रमित हैं तो कैसे अपेक्षा की जाए सकारात्मक परिवर्तन की? क्या मिल पाएगा कोई न्याय इस विचारमूढ़ता से? स्त्री चरित्र पर उंगलियाँ उठाते ये चेहरे स्वयं के पाँव भी नहीं देखते कि कितने कीचड़ में हैं! स्वयं आपराधिक धाराओं का बोझ उठाते हुए भी इनकी निर्लज टिप्पणी लज्जा को भी लज्जित कर दे। इनकी स्वार्थी नीयत क्या चरित्रहीनता की प्रतीक नहीं है? क्या इन पर अंकुश लगाने का कोई प्रबंध नहीं होना चाहिए? इन बड़बोलों के विरुध कोई कार्रवाही क्यों नहीं होती? ये कानून के निर्माता है, संविधान के रचियता हैं। देश की प्रत्येक संस्था व व्यवस्था इनकी मुट्ठी में हैं। शायद तभी सौ गुनाह करके भी ये निर्दाेष हैं। वर्तमान राजनीति में क्राँतिकारी परिवर्तनों की आवश्यकता है। एक ऐसी राजनीति जो स्वार्थभाव से परे देशहित के विषय में विचार करे। अंग्रेजों ने भारतीय मस्तिष्कों को नियंत्रित करने के लिए ‘डाउनवर्ड फिल्ट्रेशन थियोरी’ को अनुसरण किया। इसके तहत उन्होंने उच्च वर्ग को शिक्षित करना आरंभ किया। इस थियोरी के अनुसार, जिस जीवन शैली का उच्च वर्ग यापन करता है, निम्न व मध्यम वर्ग भी उसी जीवन शैली का अनुसरण करता है। भारत मंे आज्ञा का अनुपालन करने वाले बाबूओं का निर्माण करने के ध्येय से इस थियोरी का क्रियान्वयन किया गया। हुआ भी वही। अंग्रेजों की इस नीति ने यह तो सिद्ध कर दिया कि परिवर्तन का क्रम ऊपर से नीचे की ओर चलता है। अगर हम भारत को एक आदर्श राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं तो निश्चित रूप से भारतीय राजनीति का विशदीकरण किया जाना चाहिए। हालांकि यह एक लतीफा है परन्तु ईश्वर से प्रार्थना है कि सच हो जाए.................. जून 22, 2011 के दैनिक समाचार-पत्र दैनिक जागरण के मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश में बलात्कार और महिलाओं से छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं के मद्देनज़र राज्यसरकार (सुश्री मायावती सरकार) ने दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं में संशोधन का फैसला किया था। इसके अनुसार बलात्कार से जुड़े मुकदमों का फैसला सिर्फ छः महीनों में (सीआरपीसी की धारा 235 में एक उपधारा जोड़ी जाएगी) हो जाएगा। बलात्कार के आरोपी को तब तक जमानत नहीं मिलेगी, जब तक वह यह साबित न कर दे कि वह दोषी नहीं है और महिलाओं की शील भंग से जुड़े सभी अपराध भी गैर जमानती हो जाएंगे। तमिलनाडु में इस प्रकार की घटनाओं के लिए गैर जमानती वारंट का प्रावधान है। निःसंदेह यह संशोधन कानूनी प्रक्रिया में तीव्रता लाने की दृष्टि से सहायक सिद्ध होगा। यदि इस प्रकार के अपराध गैर जमानती हो जाए तो न केवल इससे भुक्तभोगी को सुरक्षा प्राप्त होगी वरन् लोगों में कुकर्त्यों के प्रति भय भी व्याप्त होगा। आपराधिक घटनाओं पर अंकुश लगाने हेतु इस प्रकार के कठोर कानून बनाए जाने चाहिए। परन्तु बड़े-बड़े नेता बड़ी-बड़ी संस्तुतियाँ! उत्तर प्रदेश में किया जा रहा यह संशोधन कब अज्ञातवासी हो गया, कुछ पता न चला। लंबित केसों की फेहरिस्त (वृंदा करात के अनुसार देश में रेप के 80 हजार मामले लंबित हैं।) यदि एक साथ रख दी जाए तो निश्चित रूप से उसके नीचे दबने से किसी के प्राण पखेरू हो जाएंगे। ‘क्या हुआ तेरा वादा’, कवि ने भी ये पंक्तियाँ लिखते हुए न सोचा होगा कि नेताओं के संदर्भ में ये इतनी प्रासंगिक हो जाएंगी। अब बलात्कार की सजा ‘फाँसी’ को लेकर चल रही कश्मकश का भी परिणाम ऐसी ही कुछ रहेगा, इसका हमें पूर्ण विश्वास है। एक यही तो भरोसा है जो डगमगा नहीं सकता। बलात्कार की सजा ‘फाँसी’ के विरोध में एक मुद्दा बहुतायत उठाया गया कि यदि फाँसी की सजा निर्धारित की गई तो सबूत मिटाने के लिए हत्याएँ बढ़ जाएँगी। परन्तु अगर न्याय पाने के लिए 15-15 साल ज़लील होना पड़े तो क्या यह किसी हत्या से कम है? 15-20 साल खौफ़ के साए में जीना पड़े, क्या यह कोई जीवन है? और बेखौफ़ घूम रहे अपराधी ही अगर हत्या कर दें??? और सर्वाधिक कष्टकारी यदि 20 साल के बाद भी न्याय न मिले??? मिले तो 7 वर्ष की...??? 20 साल का संघर्ष, पीड़ा, खौफ़, जलालत सब भुक्तभोगी के हिस्से में और सजा 7 वर्ष की................ क्या यह अन्याय नहीं है। यही कारण है कि भुक्तभोगी न्यायालय जाने से कतराते हैं क्योंकि वहाँ अन्याय की गारंटी है। अगर बलात्कार की सजा फाँसी हो तो उसके दो मुख्य लाभ हैं- एक, अपराधी के मन में खौफ़ उत्पन्न हो जाएगा और इस प्रकार के अपराध कम हो सकेंगे। कहा भी गया है- स्पेयर द रोड़, स्पाइल द चाइल्ड। अनुशासन के लिए दंड आवश्यक है। दो, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दूषित मानसिकता का प्रसार न हो पाएगा। इस प्रकार के अपराधी समाज मंे एक नासूर की भाँति हैं। यदि समय रहते इस अंग को पृथक न किया गया तो यह समाज के अन्य अंगों को भी क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। ये अपराधी अपने सम्पर्क में आए व्यक्तियों को अभिप्ररित करते हैं। इसका प्रमाण दिल्ली गैंगरेप में सम्मिलित वह नाबालिग अपराधी है जिसकी वैचारिक क्षमता अन्य अपराधियों से प्रभावित एवं संचालित थी। ज़रा सोचिए ऐसे अपराधियों की घातक उपस्थिति समाज में वैचारिक अतिक्रमण के संचरण में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती होगी! ऐसे नासूरों का सामाजिक बहिष्करण स्वस्थ समाज की प्रथम प्राथमिकता होनी चाहिए, जिससे इनकी उपस्थिति किसी भी अपराधिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहित न कर सके। अतएव इस अपराध के दंडस्वरूप एकमात्र सजा फाँसी ही होनी चाहिए। मात्र नवीन कानूनों का निर्माण किसी भी समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं है। सही मायनों में देखा जाए तो हमारे देश में अपराधों को रोकने के पर्याप्त कानून मौजूद हैं। आवश्यकता है उन्हें सुचारू रूप से क्रियान्वित करने की। न केवल दिल्ली की अपितु देशभर की पुलिस अपनी कर्तव्यनिष्ठा को प्रमाणित करने में अक्षम सिद्ध हो रही है। क्या कारण है कि पुलिस स्वयं को समाज के साथ नहीं जोड़ पा रही है? पुलिस होना क्या कोई अनोखी बात है? या पुलिस स्वयं को प्राप्त अधिकारों के नशे में अपने दायित्वबोध से विमुख हो गई है? क्यों एक आम आदमी पुलिस के नाम से भी डरता है? क्यों भुक्तभोगी की चित्कार बंद कमरों में विलुप्त हो जाती है? क्यों आज अपराधियों से अधिक भय पुलिस का व्याप्त है? क्यों देश के नागरिक कानूनी पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते और कमाल की बात तो यह है कि कानून के रखवाले, इसके निर्माता व संशोधनकर्ता भी इन पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते। शायद इसे ही आपसे समझौते की स्थिति की संज्ञा दी जाती है। पारस्परिक समझ का इससे उम्दा उदाहरण क्या हो सकता है? जून 22, 2011 (दैनिक जागरण, पृष्ठ-11) के एक समाचार के अनुसार उत्तर प्रदेश में दुराचार का औसत हर दिन चार बलात्कार का है। 2010 में दुराचार के 1290 मामले दर्ज किए गए। 2012 में देश में हर 22 मिनट में एक बलात्कार की घटना घटित होती है। उत्तर प्रदेश में दिसंबर से पिछले दस महीनों में 1500 दुराचार की घटनाएँ (मायावती के आंकड़ों के अनुसार) दर्ज की गई। वस्तुतः पुलिस की संवेदनहीनता ने पुलिस को ही कटघरे ला खड़ा किया है। शिकायतकर्ता की शिकायत दर्ज न करना, भ्रष्टाचार की अंतिम सीमा तक गिरा हुआ अभद्र व्यवहार, निष्ठुर एवं कठोर शब्दावली, अशोभनीय प्रश्नावली, शोचनीय मुद्राएँ पुलिस की विश्वसनीयता समाप्त कर चुकी हैं। पुलिस होना एक जिम्मेदारी कम अंहकार का विषय अधिक हो गया है। कितनी ही बार हमारी रक्षक कही जाने वाली पुलिस ही भक्षक का रूप धारण करती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पुलिस के चोगे में कोई अपराधी ही उपहास कर रहा हो! कौन सुनेगा इस आवाम की आवाज़??? मुझे याद है बलात्कार/रेप जैसे शब्द अपने अभिभावकों के सम्मुख हम सुनते भी झिझकते थे। टीवी चैनल पर इन घटनाओं से संबंधित खबरें आते ही बगले झांकना व समाचार पत्रों के पृष्ठ को झट से पलट देना यह इसलिए नहीं होता था कि इस प्रकार के समाचारों से हम मुख मोड़ना चाहते थे वरन् इन शब्दों का परिवार के मध्य प्रयोग न होना, शर्म-हया का प्रतीक समझा जाता था। पिछले कुछ दिनों में मीडिया में इन शब्दों का इस प्रकार खुलकर प्रयोग हुआ है कि चार वर्ष के बच्चे को बलात्कार का अर्थ भले ही न पता हो परन्तु वह इस शब्द से भली-भाँति परिचित है। निःसंदेह मीडिया ने दिल्ली गैंगरेप कांड में अपनी महती भूमिका निभाई है, जिसके लिए उसकी सरहाना की जानी चाहिए। सच कहें तो इस कांड के प्रति सर्वाधिक गंभीर, जिम्मेदार एवं संवेदनशील भूमिका मीडिया ने ही अदा की है। पूरी घटना का कवरेज मानो निष्पक्ष एवं स्वार्थरहित रहा हो। परन्तु अगर इस घटना के कवरेज के दूरगामी परिणाम देखें तो वे दुर्भाग्यपूर्ण हैं। समाज में शब्दावली के प्रति जितना खुलापन मीडिया ने प्रदान किया है यह उसी का परिणाम है कि छोटे-छोटे बच्चे उन अपराधों में संलिप्त पाए जा रहे हैं जिनके अर्थ तक से वे अनभिज्ञ है। यदि चार वर्ष का बच्चा रेप शब्द के प्रति अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है तो कितना कठिन है उसके प्रश्न का उत्तर देना। और यदि वह संतुष्ट नहीं हो पाता हमारे सुलभ इलैक्ट्रॉनिक साधन जैसे इंटरनेट इत्यादि इन्हें विभिन्न प्रकार की किन्तु अनावश्यक जानकारियाँ भी अत्यन्त सरलता से प्रदान कर देते हैं। इंटरनेट पर ज्ञान के अकूत भंडार से लाभकारी अथवा विनाशक जानकारी के चयन की समझ बच्चों में नहीं होती, जिसके कारण वे भटकाव के शिकार हो जाते हैं। आज मीडिया का क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत हो चुका है। समाचारों की परिधि से बाहर इसने स्वयं को फिल्म, साहित्य व मनोरंजन इत्यादि के क्षेत्र तक विस्तार प्रदान किया है। फिल्मों का अंधानुकरण किस प्रकार हमारे समाज में किया जाता है, यह सर्वविदित है। वर्तमान में फिल्में मनोरंजन एवं पब्लिक डिमांड का वास्ता दे अश्लीलता को सामाजिक स्वीकृति दिला चुकी है। आइटम साँग की उँगली पकड़ फिल्मों में अश्लीलता की सभी मर्यादाएँ पार हो चुकी हैं। गालियाँ जिनके प्रयोग पर प्रायः परिजनों की मार व विद्यालय से अभिभावकों के पास शिकायतों का पर्चा आ जाया करता था, अब वे समस्त गालियाँ आप गानों के माध्यम से बहुत सरलता से प्रयोग कर सकते हैं। काश! संेसर बोर्ड ने ‘इश्क कमीना’ को सेंसर किया होता तो आज ‘हनी सिंह’ की हिम्मत इतनी न बढ़ी होती। यदि महेश भट्ट की प्रथम प्रस्तुती पर संेसर बोर्ड ने अपनी जिम्मेदारी का भलीभाँति पालन किया होता तो यह मर्यादा ‘डर्टी पिक्चर’ तक कभी उल्लंघित नहीं होती। पब्लिक डिमांड के नाम पर फिल्मों का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। फिल्मों का उद्देश्य समाज को अभिप्रेरित, सजग एवं जागरूक करना है। इसके लिए यह कतई आवश्यक नहीं है कि फिल्मों का स्तर गिराया जाए। यदि प्रतिस्पर्धा के दबाव से मुक्त हो सभी निर्माता शालीनता के प्रति अपनी मस्तिष्क का प्रयोग करें अथवा प्रतिस्पर्धा, अच्छा और अच्छा करने की, की जाए तो निश्चित रूप से एक आदर्श समाज का निर्माण हो सकेगा। ऐसा नहीं है कि ‘एंटरटेन्मेंट’ की दुनिया में मात्र अश्लीलता ही है। बहुत से टीवी चैनल जैसे ‘सब टीवी’ ‘एंटरटेन्मेंट एवं शालीनता’ की मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। हल्के-फुल्के लतीफों के माध्यम में जीवन का अद्भुत संदेश इस पर प्रसारित नाटकों के माध्यम से दिया जाता है। यदि सम्पूर्ण फिल्म जगत यह निश्चित कर ले कि सामाजिक मूल्यों की हत्या किए बिना मनोरंजन की प्रस्तुती की जाएगी तो ‘समाज वही देखता और स्वीकारता है जो इनके द्वारा दिखाया जाता है’। आज भी धार्मिक सीरियल उसी श्रद्धा से देखे जाते हैं जिस श्रद्धा से वर्षों पूर्व महाभारत और श्रीकृष्णा देखे जाते थे। सत्यमेव जयते, कौन बनेगा करोड़पति, परवरिश इत्यादि की टीआरपी सिद्ध करती है कि जनता मात्र नग्नता की प्रशंसक नहीं है। आस्ट्रेलियन चाइल्डहुड फाउंडेशन द्वारा किए गए शोध के अनुसार ‘अश्लील और हिंसक विज्ञापन बिगाड़ते हैं बच्चों का व्यवहार’। विज्ञापनों और वीडियो गेम में परोसे जा रहे ऐसे दृश्यों से छोटे बच्चों यानी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का व्यवहार हिंसात्मक हो रहा है। इन विज्ञापनों एवं वीडियों गेम के आदि बच्चों के सेक्सुअल व्यवहार न केवल अनैतिक थे बल्कि विपथगामी थे। वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले एक दशक से बच्चों में यह प्रवृत्ति करीब 20 गुना तेजी से बढ़ी है। उपर्युक्त रिपोर्ट से समस्या की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि क्यों हमारे बच्चे आक्रमक, अनियंत्रित एवं पथभ्रष्ट हो रहे हैं? मीडिया का सकारात्मक योगदान इस तस्वीर को बदल सकता है। मीडिया लोगों के मस्तिष्क को नियंत्रित करता है। लोग वहीं समझते हैं जो यह समझाना चाहता है। यह समझाता है कि किस प्रकार नम्बर वन हिरोइन बनने के लिए अभिनेत्री (डर्टी पिक्चर एवं हिरोइन) उल्लंघित होती है? किस प्रकार सुपर मॉडल (फैशन) बनने की लालसा उन्हें आत्मसम्पर्ण का मार्ग दिखाती है? परन्तु मीडिया यह क्यों नहीं दिखाता कि वह (अभिनेत्री एवं सुपर मॉडल) जिसके सामने सम्पर्ण कर रही हैं वह कितना दोषी है? ‘तू नहीं कोई और सही कोई और नहीं कोई और सही’ की नीति अपना, किसी मासूम के सपनों को भुनाने का अधिकार पुरूष के पास ही क्यों सरंक्षित है। दमनकारी कूटनीतियाँ भोले मन को सरलता से फँसा अटखेलियाँ करती हैं और दोषारोपन कर छल व कपट की स्वयं की सफलता पर निर्लज भाव से इठलाती भी हैं। क्या कभी मुक्ति मिलेगी इस अन्याय से??? यह लेख कहीं न कहीं स्वयं भी पक्षपाती रहा है। ऐसा नहीं है कि समाज के समस्त पुरूष कुटिल हैं और समस्त स्त्रियाँ निर्दाेष। समाज में जिस प्रकार विभिन्न वर्गों-धर्माें-जातियों के लोग रहते हैं, उसी प्रकार विभिन्न चरित्रों के व्यक्ति भी हैं। परन्तु वर्तमान परिस्थितियाँ सौम्यता पर कुटिलता के आवरण को हावी प्रदर्शित कर रही हैं। अतएव आदर्श समाज के लिए श्रेष्ठ-तुच्छ के मध्य विभेद करने की सजगता एवं क्षमता विकसित करनी आवश्यक है। भारतवर्ष अकूत मानवीय ऊर्जा का स्वामी है। यदि इस ऊर्जा का सकारात्मक दोहन किया जाए तो विश्वपटल पर ‘सोने की चिड़िया’ का खिताब भारत पुनः प्राप्त कर लेगा।