Thursday, April 26, 2012

ना कोंसो अब हमें

i-next में उठाये गये प्रश्न ‘तो क्या लड़कियां ही हैं रेप की जिम्मेदार?’ के मुख्य दो कारण हैं- एक, कि यह प्रश्न वास्तव में जानना चाहता है कि रेप का वास्तविक कारण है क्या? दूसरा, इस प्रकार की शर्मनाक एवं दुखद घटनाओं के प्रति आने वाले वे असंवेदनशील संवाद जो उच्च पदों पर विराजमान शिरोमणियों के मुख से प्रकट हुए। डिप्टी कमिश्नर, डीजीपी, दिल्ली पुलिस कमिश्नर, सीएम दिल्ली एवं दिल्ली पुलिस, सभी के अनुसार लड़कियां अपने साथ हुई किसी भी दुर्घटना के लिए स्वतः जिम्मेदार है। किसी के अनुसार लड़कियों का पहनावा दोषी है तो किसी के अनुसार असमय उनका असुरक्षित यात्रा अथवा नौकरी करना। कितनी विचित्र स्थिति है कि एसी आफिस में बैठने वाले अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ने के लिए ‘चोरी और ऊपर से सीना जोरी’ कर रहे है! पुलिस एवं सरकार की पहली जिम्मेदारी देश के प्रत्येक नागरिक को सुरक्षा के भाव का अहसास कराना है। ऐसे में ये उल्टी नसीहत उन्हें नागरिकों द्वारा कष्ट प्रदान न किये जाने का आदेश दे रही है। उन्नति की दौड़ में अपेक्षाओं से अधिक परिणाम प्रस्तुत कर अपने वजूद का लौहा मनाने वाली महिलाओं को सुरक्षा के नाम पर कैसे घर बैठकर आलू-गोभी काटने का हुक्म सुनाया जा सकता है? और इस प्रकार कैद महिलाओं की आन्तरिक सुरक्षा की क्या गारंटी? 15 मार्च 2012 को अमर उजाला में प्रकाशित समाचार ‘ नौ साल की उम्र में पहला एबार्शन’ लड़कियों की घरेलु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह आरोपित करने के साथ-साथ दी जाने वाली नसीहतों को शर्मिंदा भी करता है। नाबालिकों के साथ आये दिन होने वाले दुर्व्यवहारों के लिए हमारे इन आलाकमानों के पास क्या नसीहत है? ऑफिस में बैठकर सुझावों एवं सलाहों के भँवरों में आम आदमी की सोच को गुमराह करने से बेहतर है एक सटीक रणनीति का निर्माण किया जाए और एक ऐसा समाधान प्रस्तुत किया जाये जिससे वास्तव में लड़कियों को सुरक्षित संरक्षण प्राप्त हो सके और वे अपने सपनों का आकाश पा सकें।

6 comments:

  1. achchhi prastuti .ise ''bhartiy nari '' blog par prakashit kar rahi hun .aabhar .BHARTIY NARI

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    1. धन्यवाद शिखा जी

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  2. नीरज जी ,यहाँ सवाल ना तो पहनावे का है ..और ना ही किसी के कुछ भी भोंक देने का ....दरअसल हमारे संस्कार ही ऐसे हो गये है कि हम अपने बच्चो को संस्कार देने भूल गये है ...जो लोग महिलाओ कि हिफाजत पर लम्बे चौड़े व्याखान देते है ..उनके मन भी कितने साफ है ..दरअसल अपनी बेटी को बेटी और दुसरे कि बेटी को माल समझने कि कुत्सित संस्क्रती ही पुरुष को हैवान बनाती है ...हमने अपने बच्चो को ये बताना बंद करदिया है कि पडोस वाले तिवारी अंकल कि बेटी श्वेता भी उनकी बहन लगती है ..वो हमारे घर आती है तो मम्मी बड़े फक्र से कहते है हमारे चिंटू कि फ्रेंड है ....मानते है कि बलात्कार करना एक मानसिक फितूर है मगर नीरज जी पूरी विनम्रता और नारी जाती के पार्टी सम्मान के साथ कहना चाहूँगा कि ...चुनरी कहा चली गयी थी ..और वापस लौटी है तो कितना विद्रूप और कष्ट कारी रूप लेकर ...अब कुछ लडकिया इसका इस्तेमाल मुंह ढापने में सिर्फ इसलिए कर रही है कि कही उसको अपने दोस्त के साथ मटरगस्ती करते उसका पडोसी ना देख ले ....पतन तो हर जगह है ..बहुत मंथन कि जरूरत है .........

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    1. आपकी बात स्वीकारती हु सर। परंतु एक आग्रह भी है कृपया सोचिए उस समाज के विषय मे जिसे किसी की वेशभूषा से कोई सरोकार न हो। बस प्रगति की दौड़ मे कर्मशील हो आगे बढ्ने की चाह हो........ आदिमनव की भांति संघर्षरत जीवन मे वस्त्रहीन स्तिथि मे भी सदविचारों से युक्त था। तो क्या आज की इस पीढ़ी को तकनीकी की तीव्र चाल ने कर्महीन बना कुत्सित कर्मो की रह पर धकेल दिया है?
      वास्तविक कारण की खोज अति आवयाशयक है!!!!!!!!!!!!

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  3. सर आपके विचारो से मैं कहीं हद तक सहमत हु परंतु फिर भी कहना चाहूंगी कि कुछ बातें है सांस्कृतिक विभिन्नता की। समय बदला है, स्थितियाँ बदली है, हालत बदले है, जीवन स्तर मे परिवर्तन हुआ है , रहन-सहन के तौर तरीको मे बदलाव आया है। ऐसे मे हम यह आशा कैसे कर सकते है कि स्त्रियाँ अपने उसी पुराने लबादे में सिमट कर रहे जिसमे वह 50 वर्ष पूर्व थी? और भला करें भी क्यूँ?
    बहरहाल यहाँ मेरा पप्रश्न समाज से उन बच्चियों, वृद्धाओं तथा पर्दे व बुर्के मे कैद उन महिलाओं के ओर से है जो इस प्रकार कि वीभत्स घटनाओ का शिकार होती है। क्या यह आवश्यक है कि लक्षमण रेखा मे सिर्फ महिलाओं को कैद किया जाए? क्या नज़रिया बदला जाना, हमारी मांग नहीं हो सकती?

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  4. mahilao ko kya pehanna chahiye au kya nahi iska faisla karne ka adhikaar sirf mahilao ko hai purusho ko nahi kya mahilaye purush ke pehanne par apne adarsh thopti hai?nahi to phir purusho ko ye adhikaar kaise mil sakta hai, vaastav me asli samasya purush pradhan samaaaj ki mansikta hai jo mahilao ko har tarah se apne control me karna chahti hai. mausam ke hissab se hum apne pehnaave me parivartan kar sakte hai aur mahilaye nahi kyu?kya samaj ki maryada banaye rakhne ki jimmedari mahilao ki hai purusho ki nahi isiliye hume pehle apne dimaag ki vaasna ko control karna chahye na ki mahilao ke pehnave ko

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